जबलपुर। मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू होने के बाद उससे संबंधित एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सामने आया। यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को याचिकाकर्ता ने वापस ले लिया, जिसके बाद हाईकोर्ट ने उसे निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लागू कानून के किसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर भविष्य में अलग याचिका दायर की जा सकती है।कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि राज्य विधानसभा से यूसीसी विधेयक पारित होकर कानून का रूप ले चुका है। ऐसे में पहले दायर याचिका अब प्रभावहीन हो गई है। इस आधार पर याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
यह जनहित याचिका भोपाल के पूर्व पार्षद मेवालाल ने दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि समान नागरिक संहिता लागू करने से पहले संविधान में निर्धारित आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसमें विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े राष्ट्रीय आयोगों से परामर्श नहीं लेने का मुद्दा उठाया गया था।
याचिका में यह भी कहा गया था कि प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रथागत कानूनों का संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में यूसीसी के कुछ प्रावधान इन अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण संबंधी प्रावधान को निजता के मौलिक अधिकार के विपरीत बताते हुए चुनौती दी गई थी।राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने पक्ष रखा। सुनवाई के अंत में हाईकोर्ट ने याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर निरस्त कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि यदि लागू यूसीसी के किसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर विवाद उत्पन्न होता है तो संबंधित पक्ष नई याचिका दायर कर न्यायिक परीक्षण की मांग कर सकता है।