भोपाल मध्य प्रदेश भाजपा में “संगठन पहले” का फॉर्मूला अब सख्ती से लागू होगा। दतिया जिले में उपचुनाव से पहले संगठन में दिखी गुटबाजी और जिलाध्यक्ष द्वारा सामूहिक इस्तीफे की पेशकश के बाद पार्टी हाईकमान ने प्रदेशभर में जिलाध्यक्षों के कामकाज की समीक्षा शुरू कर दी है।संगठन सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के करीब 12 जिलों में ऐसे जिलाध्यक्ष हैं जिनकी नियुक्ति किसी मंत्री या विधायक की सिफारिश पर हुई थी। अब इनके प्रदर्शन का ऑडिट हो रहा है।
*दतिया से शुरू हुआ “फैक्टर”*
दतिया में उपचुनाव की घोषणा के बाद जो घटनाक्रम सामने आया उसने पार्टी को झकझोर दिया। जिलाध्यक्ष द्वारा पूरी टीम के साथ इस्तीफे की पेशकश, कार्यकारिणी गठन में देरी और नेताओं के बीच श्रेय की लड़ाई ने कार्यकर्ताओं में संदेश दिया कि संगठन कमजोर हो रहा है।
पार्टी का मानना है कि जब जिलाध्यक्ष किसी एक नेता के प्रभाव में काम करने लगते हैं तो बूथ का कार्यकर्ता सबसे ज्यादा प्रभावित होता है।
*प्रदेश में क्या है स्थिति*
प्रदेश संगठन द्वारा मंगवाई गई रिपोर्ट में सामने आया कि कई जिलों में भी यही स्थिति है। जिन 12 जिलाध्यक्षों को चिन्हित किया गया है उन पर मुख्य आरोप:
1. *गुट विशेष को तरजीह*: संगठन के पदों पर सिर्फ अपने संरक्षक नेता के समर्थकों को बैठाना
2. *कार्यकारिणी में देरी*: राजनीतिक कारणों से महीनों तक जिला कार्यकारिणी घोषित न करना
3. *कार्यकर्ता संवाद की कमी*: बूथ और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क न रखना
4. *पार्टी की जगह व्यक्ति का प्रचार*: सरकारी योजनाओं का श्रेय संगठन को न देकर व्यक्ति विशेष को देना
*हाईकमान का निर्णय*
प्रदेश प्रभारी और संगठन महामंत्री को निर्देश दिए गए हैं कि वे हर जिले में जाकर सदस्यता, बूथ प्रबंधन और कार्यक्रमों के आधार पर जिलाध्यक्षों का मूल्यांकन करें।
संगठन का स्पष्ट मत है कि 2028 की तैयारी के लिए अब “सिफारिशी” नहीं “काम करने वाले” जिलाध्यक्ष चाहिए। रिपोर्ट आने के बाद अगले 45 दिन में खराब प्रदर्शन करने वाले जिलाध्यक्षों को बदला जा सकता है।
राजनीतिक संदेश
“दतिया फैक्टर” अब भाजपा के लिए एक केस स्टडी बन गया है। पार्टी ने कार्यकर्ताओं को साफ संकेत दे दिया है कि अब पार्टी में व्यक्ति नहीं, संगठन सर्वोपरि होगा।
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