जबलपुर -जिसका मन वश में नहीं है, वही तो विवश है। यदि आपका मन शांत नहीं है तो हिमालय की शांति भी आपके जीवन को अशांत करने वाली प्रतीत होगी। अशांति कहीं और से नहीं आती, भीतर से आती है, इसका जन्मदाता आपका मन ही है। जिसने मन को साध लिया वही तो साधु है। निरन्तर अभ्यास से इस मन को नियंत्रित किया जा सकता है। जो भीतर शांत है उसके लिए बाहर भी सर्वत्र शांति ही है। मन न तो कभी तृप्त होता है और न ही एक क्षण के लिए शांत बैठता है। यह अभाव और दुःख की ओर बार-बार ध्यान आकर्षित कराता रहता है। कभी कहीं आपको यथोचित सम्मान न मिला तो अकारण ही यह बार-बार अपमान होने का अहसास कराता रहेगा। मन सदैव अहम का पोषण चाहता है क्योंकि जहाँ मनुष्य के अहम को ठेस पहुँचती है, वहीं मन दुःखी हो जाता है। मन को साध लेना ही तो जीवन की साधना भी है। परिवार में सुख शांति और समृद्धि के लिए आपसी सहमति और सामंजस्य अति आवश्यक है उक्त उद्गार भागवताचार्य स्वामी श्रीअशोकानंद जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण रूक्मिणी मंगल परिणय, 16108 विवाह प्रसंग और द्वारिका धीश स्वरूप में शासन कथा प्रसंग में श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के षष्ठम दिवस व्यास पीठ से कहे।
भक्ति धाम गौरीघाट में पितृपक्ष में नर्मदा मैया के तट पर परम पूज्य भागवताचार्य स्वामी श्रीअशोकानंद जी महाराज के श्रीमुख से आज 2 अक्टूबर को दोपहर 4 बजे से श्रीमद् भागवत महापुराण की सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष की कथा व्यास पीठ से श्रवण करायेंगे।भागवत सेवा समिति के भागवत सेवा समिति विजय पंजवानी दिलीप तलरेजा, गोविंद हिरानी, शमन आसवानी, नरेंद्र केसवानी, जयप्रकाश प्रिया पंजवानी, जेठानंद खत्री, पप्पू लालवानी, गोपाल सावलानी, उमेश पारवानी,वेदान्त शर्मा, करिश्मा शर्मा ,
जया लालवानी, हितिशा शर्मा ,विनू माखीजा ,ममता कुकरेजा, घनश्याम निरंकारी, पुष्पराज पंडित,लालू महाराज, अभिषेक, रामजी पुजारी ने श्रृद्धालु भक्तों से उपस्थिति का आग्रह किया है।