हाई कोर्ट ने पूछा क्या एक अंक से बचाया जा सकता है मेडिकल छात्र का 1 साल चांसलर से जवाब मांगा

जबलपुर। सिर्फ एक अंक की कमी से मेडिकल छात्र का पूरा साल बर्बाद होने का संकट सामने आने पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है। गजरा राजा मेडिकल कॉलेज (GRMC) के एमबीबीएस छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी के चांसलर   से जवाब मांगा है।ग्वालियर निवासी छात्र राम नरेश कुशवाहा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि वह गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं और वर्तमान में सेकंड प्रोफेशनल की नियमित कक्षाएं अटेंड कर रहे हैं। लेकिन प्रथम वर्ष में सिर्फ एक अंक की कमी के कारण उनके सामने आगामी परीक्षा में शामिल होने से रोके जाने का संकट खड़ा हो गया। याचिका में मांग की गई है कि संबंधित अधिकारियों को छात्र को ग्रेस मार्क्स देने के संबंध में उचित निर्देश दिए जाएं, ताकि महज एक अंक की कमी के कारण उसका शैक्षणिक वर्ष प्रभावित न हो।—

क्या मिल सकता है एक अंक का ग्रेस?

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष सोनकर और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित उपस्थित हुईं। सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष मध्य प्रदेश यूनिवर्सिटीज कॉमन ऑर्डिनेंस नंबर-6 के क्लॉज 32 का प्रावधान रखा गया, जिसके तहत  (चांसलर) को असाधारण और कठिन मामलों में ग्रेस मार्क्स देने की विशेष शक्ति प्राप्त है। इसी प्रावधान के आधार पर हाईकोर्ट ने पूछा है कि क्या एक मेधावी छात्र का साल बचाने के लिए उसे एक अंक की अनुकंपा देने का कोई प्रावधान मौजूद है।हाईकोर्ट ने फिलहाल छात्र को सीधे एक अंक ग्रेस देने का आदेश नहीं दिया है। कोर्ट पहले यह स्पष्ट करना चाहती है कि संबंधित नियमों और चांसलर की शक्तियों के तहत ऐसी परिस्थिति में ग्रेस मार्क्स देने की अनुमति है या नहीं। मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी के चांसलर के जवाब के बाद ही मामले में आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

15 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

डिवीजन बेंच ने मामले में नोटिस जारी करते हुए 15 सितंबर 2026 को अगली सुनवाई निर्धारित की है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि यूनिवर्सिटी की ओर से एक अंक ग्रेस देने को लेकर क्या जवाब प्रस्तुत किया जाता है।
यह मामला सिर्फ एक छात्र के भविष्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होगा कि मेडिकल शिक्षा से जुड़े नियमों में मेधावी छात्रों के हित में कितनी लचीलापन की गुंजाइश मौजूद है, और भविष्य में इसी तरह के अन्य मामलों में यह फैसला एक नजीर के रूप में देखा जा सकता है।