14 साल बाद भी बहाली नहीं, हाईकोर्ट ने दिया तीन सप्ताह का अंतिम मौका

जबलपुर। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) के दो बर्खास्त हेल्पर कर्मचारियों को श्रम न्यायालय और हाईकोर्ट से राहत मिलने के बावजूद सेवा में बहाल नहीं किए जाने पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अवमानना याचिका क्रमांक CONC No. 446/2026 (दुर्गेश कुमार सोनी एवं अन्य विरुद्ध रंजन सिंह ठाकुर) की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने शासन को तीन सप्ताह का अंतिम अवसर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में आदेश का पालन कर अनुपालन प्रतिवेदन पेश नहीं किया गया तो संबंधित प्रतिवादी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 से प्रारंभ होने वाले सप्ताह में नियत की गई है।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता दुर्गेश कुमार सोनी और रूपलाल मेहरा पीएचई विभाग में 11 वर्ष से अधिक समय तक हेल्पर के पद पर कार्यरत रहे। आरोप है कि नरसिंहपुर के कार्यपालन यंत्री ने उन्हें मौखिक आदेश के जरिए सेवा से पृथक कर दिया था। इसके खिलाफ कर्मचारियों ने श्रम न्यायालय नरसिंहपुर की शरण ली, जहां 14 दिसंबर 2016 को उनके पक्ष में अवार्ड पारित करते हुए 25 प्रतिशत वेतन के साथ सेवा में बहाली के आदेश दिए गए।

श्रम न्यायालय के फैसले को शासन ने चुनौती दी और मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में चलता रहा। हाईकोर्ट की एकलपीठ के निर्णय के विरुद्ध शासन ने रिट अपील दायर की, जो खारिज हो गई। इसके बाद पुनर्विचार याचिका भी दायर की गई, जिसे 15 हजार रुपये की कॉस्ट के साथ खारिज कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह राशि भी अब तक जमा नहीं की गई है। इसके बाद शासन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन एसएलपी (सी) डायरी क्रमांक 47134/2026 भी 21 सितंबर 2026 को खारिज हो गई। इस तरह हाईकोर्ट का 10 सितंबर 2025 का आदेश प्रभावी बना रहा।

इसके बावजूद कर्मचारियों की सेवा बहाली नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शासन के पास बहाली के आदेश पर अमल रोकने वाला कोई स्थगन आदेश नहीं है, इसके बाद भी उन्हें सेवा में वापस नहीं लिया गया। इससे उन्हें लगातार आर्थिक और सेवा संबंधी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

29 अक्टूबर को हुई सुनवाई में कोर्ट ने उल्लेख किया कि प्रतिवादी 6 फरवरी 2026 को वकालतनामा के माध्यम से उपस्थित हो चुके थे, लेकिन इसके बावजूद अब तक आदेश के पालन का प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया। शासन की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने अनुपालन के लिए समय मांगा, जिस पर कोर्ट ने तीन सप्ताह का अंतिम अवसर प्रदान किया। साथ ही चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक आदेश का पालन नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा।याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता नर्मदा प्रसाद चौधरी और अमित चौधरी ने पैरवी की, जबकि शासन की ओर से अधिवक्ता मोनिका लोधी उपस्थित रहीं। अब इस मामले में 23 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि शासन को तब तक हाईकोर्ट के आदेश के पालन की स्थिति स्पष्ट करनी होगी।