खेती में कभी घाटा नहीं होगा …अपनाये खेती का यह मॉडल


  जबलपुर ज्यादातर दो तरह से किसान हमेशा मारे जाते हैं। घाटा उठाते है। पहली मौसम की मार आंधी, तूफान और अधिक बारिश की वजह से ठीक से फसल उत्पादन नहीं हो पाता है, और दूसरा उत्पादन अच्छा हुआ,भारी पैदावार हुई तो भी तो भी मार्केट में भाव गिर जाने से किसानों को उचित रेट नहीं मिलना ।  अभी भी इतने वर्षों में  कुछ नहीं बदला, आज भी बहुत बार किसानों को अपनी फसल या तो फेंकनी पड़ती है या खेतों में खड़ी फसल जोतनी पड़ती है या उसे घाटा उठाना पड़ता है। ऐसे कभी भी किसान खेती से खुशहाल और समृद्ध नहीं हो पाएंगे..  तो फिर बात आती है की रास्ता क्या है ?? … वह कौन सी ऐसी खेती का मॉडल है जिससे किसान सफल हों, समृद्ध हों, खुशहाल बनें और अच्छी आमदनो ले पाएँ ..  सबसे पहले किसानों को बड़े पैमाने पर मोनोक्रॉपिंग यानी किसी एक या दो फसल को उगाना बंद करना होगा, उसकी जगह पर जितना एरिया हो उसमें बांट बांट कर  ज्यादा से ज्यादा फसलें लगानी होगी । जो फसलें जिस एरिया में हो सकती हैं, वह ज्यादा से ज्यादा अलग-अलग फसलें अलग-अलग खेतों में लगानी होगी  ..रबी मे गेहूँ, चना, मसूर, अलसी, मटर, आदि खरीफ में धान,मक्का, सरसों, तिल, चिया आदि सब्जी में भी सभी प्रकार की सब्जी एरिया बांट बांट कर लगानी चाहिए।  फसल उत्पादन के साथ-साथ किसान और  उनके बच्चों को, युवाओं, महिलाओ को, गांव में रह रहे पढ़े लिखे नवयुवकों को खेती के उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग में भी आगे  आना होगा, यानी जो किसान अनाज उगाएं, सब्जियां उगाए उनको सीधे मार्केट मे बेचने की बजाय उसके कुछ हिस्से का कोई ना कोई फाइनल प्रोडक्ट बना कर बेचना चाहिए, जिससे प्रोसेसिंग करके   किसानों को ज्यादा से ज्यादा मूल्य मिल पाए, और युवाओं के लिए भी एक स्टार्टअप , एक रोजगार खड़ा हो। जैसे… सरसों की जगह… सरसों का तेल, गेहूं की जगह दलिया और आटा, हल्दी धनिया की जगह हल्दी धनिया का पाउडर, गन्ने की जगह गुड और सिरका, खड़ी दाल की जगह दाल बनाकर पैकिंग करके, धान बेचने की जगह चावल। आलू के चिप्स, मटर आदि अच्छी पेकिंग करके बेचा जाए।
खेती ऐसी की जाए जिससे हमें हर दिन साल भर आमदनी होती रहे, इसमें नगदी फसलें, साग सब्जी, फल फूल की खेती के साथ पशुपालन, मुर्गी व मतस्य पालन, हरा चारा, उद्यानिकी व मेढों पर अन्य पेढ़ लगाना भी सम्मलित करना होगा। ज्ञात हो हमारे पूर्वज भी यही करते थें । वैज्ञानिक इसे इंटिग्रेटेड या एकीकृत फार्मिंग कहते हैँ।  इस मॉडल की खेती से   सबसे पहला लाभ तो यह है की किसान के परिवार के लिए अलग-अलग फैसले दाल सब्जी अनाज सब मिलता रहता है। दूसरा आंधी तूफान आएगा भी, अधिक वर्षा होगी भी तो कुछ फसलें खराब हो सकती हैं पर सब खराब नहीं होंगी। किसान कभी घाटे में नहीं रहेगा। तीसरा लाभ महत्वपूर्ण है फसल चक्र  अपनाने से खेत की मिट्टी उपजाऊ बनी रहेगी, बायोडायवर्सिटी इकोसिस्टम बना रहेगा।महत्वपूर्ण लाभ यह होगा की है कि किसी एक फसल का रेट नहीं मिलेगा तो दूसरी का मिलेगा, दूसरी का नहीं मिलेगा तो तीसरी का मिलेगा, आपके पास पैसो की आवश्यकता में बहुत ज्यादा किसी एक फसल को बेचने का दबाव नहीं होगा।  खेतों के किनारे किनारे ऐसे इमारती लकड़ी वाले पौधे लगाने चाहिए जिससे 5, 10, 15, 20  वर्षों में एक मुफ्त रकम मिले. जैसे, पापुलर,सागौन, महोगनी, मालाबार नीम, यूकेलिप्टस, बांस और भी जो जिस एरिया में हो जाए और उसकी डिमांड वहां की मार्केट में हो।।वर्तमान में किसान एक या दो फसलें लगाते है बड़े-बड़े एरिया में गेहूं और धान, या ज्वार और बाजार, यह आलू और प्याज। यानी महीनों इंतजार करना है फसल तैयार होने का, लगातार लागत देनी है और रोज की कोई इनकम नहीं. जबकि खर्चे तो रोज के ही हैं। जब खर्चे रोज के हैं तो इनकम भी रोज की होनी चाहिए ऐसा मॉडल जब तक किसानों का नहीं बनेगा तब तक किसान सफल नहीं हो पाएंगे, समृद्ध नहीं हो पाएंगे। आत्म निर्भर व खुश हाल नहीं हो पाएंगे। 
           … के के अग्रवाल,
                कृषि इंजीनियर