विविधता में एकता, सद्भाव और अपनत्व की अनूठी पहचान है संस्कारधानी*

पंकज दुबे, अधिवक्ता
जबलपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि अपनत्व, सद्भाव और सह-अस्तित्व की जीवंत मिसाल है। इस शहर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बाहर से आने वाले लोगों को केवल रहने की जगह नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनेपन के साथ अपनाकर अपनी पहचान का हिस्सा बना लेता है।जबलपुर के नाम को लेकर प्रचलित मान्यता महर्षि जाबालि से जुड़ी है। लोकपरंपरा के अनुसार, महर्षि जाबालि का संबंध अयोध्या के राजपरिवार से था। भगवान श्रीराम के वनगमन से जुड़ी कथाओं और महर्षि की तपस्या की परंपरा को नर्मदा तट तथा गुप्तेश्वर महादेव के निकटवर्ती क्षेत्र से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इसी क्षेत्र का नाम जाबालिपुरम पड़ा, जो कालांतर में जबलपुर कहलाया। यह परंपरा शहर की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नर्मदा की पवित्र धारा, प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं से समृद्ध जबलपुर की पहचान केवल इसकी ऐतिहासिक धरोहर तक सीमित नहीं है। इसकी असली खूबसूरती यहां के लोगों के व्यवहार और सामाजिक सद्भाव में दिखाई देती है।देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग शिक्षा, रोजगार और व्यापार के लिए जबलपुर आए और यहीं के होकर रह गए। विभाजन के समय पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए अनेक परिवारों ने भी यहां अपने जीवन की नई शुरुआत की। शहर ने उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया और उन्होंने भी अपने परिश्रम से जबलपुर की सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति में योगदान दिया।भारत में लोग अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर भी अपनी भाषा, खानपान और परंपराओं को संजोकर रखते हैं। जबलपुर की विशेषता यह है कि यहां अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के साथ दूसरों की संस्कृति का सम्मान करने की सहज भावना दिखाई देती है।पंकज दुबे ने कहा कि यहां त्योहार किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे शहर की खुशियों का हिस्सा बन जाते हैं। लोहड़ी की रौनक, ईद की सेवइयां, पर्युषण पर्व का क्षमा संदेश और क्रिसमस की खुशियां सामाजिक जीवन में आत्मीयता घोलती हैं। गणेशोत्सव को भी जबलपुर ने पूरे उत्साह से अपनाया है। गौरीघाट जैसे आस्था के केंद्रों पर विभिन्न समुदायों के लोगों की सहभागिता इस सांस्कृतिक मेलजोल को और सुंदर बनाती है।यहां भाषा, खानपान, पहनावे और धार्मिक परंपराओं की विविधता के बावजूद एक साझा पहचान दिखाई देती है—हम सब जबलपुरवासी हैं। यही भावना लोगों के बीच विश्वास, सहयोग और सुरक्षित होने का एहसास मजबूत करती है।किसी शहर की समृद्धि केवल उसकी सड़कों, बाजारों और इमारतों से नहीं मापी जाती, बल्कि इससे भी तय होती है कि वहां रहने वाला व्यक्ति कितना सम्मानित और स्वीकार्य महसूस करता है। जबलपुर की सबसे बड़ी पूंजी यही सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास है।इस विरासत को बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। दूसरों की आस्था का सम्मान करना, सुख-दुख में साथ खड़े होना और भिन्नताओं के बावजूद एक-दूसरे को स्वीकार करना ही संस्कारधानी की असली पहचान है।जबलपुर की खूबसूरती यही है कि यहां लोग सिर्फ बसते नहीं, बल्कि इस शहर को अपना घर बना लेते हैं। यह शहर सबको अपनाता है और अपने नागरिकों को भी सबको अपनाने की प्रेरणा देता है।