जब दूसरे शहरों के बच्चे जबलपुर पढ़ने आ रहे हैं, तो हमारे बच्चे बाहर क्यों जा रहे हैं?

पड़ोस के मल्होत्रा जी या वर्मा जी का बच्चा बाहर पढ़ रहा है, तो हम भी अपने बच्चे को जबलपुर से बाहर भेजेंगे। धीरे-धीरे यह धारणा बन गई है कि “इस शहर में कुछ नहीं है।”यही सोच हमारे शहर को बौद्धिक पलायन की ओर ले जा रही है। सवाल यह है कि बच्चे को बाहर भेजने का निर्णय उसकी वास्तविक आवश्यकता और भविष्य को देखकर लिया जा रहा है या सामाजिक होड़ के कारण?

*बाहर जाना जरूरी है या सिर्फ हमारी सोच बन गई है?*

किसी बच्चे की रैंक, योग्यता या विशेष पाठ्यक्रम के कारण बाहर जाना जरूरी हो तो निश्चित रूप से जाना चाहिए। लेकिन यदि वही शिक्षा जबलपुर में उपलब्ध है, तो केवल इसलिए बच्चे को बाहर भेजना कि दूसरे भी भेज रहे हैं—इस पर मंथन होना चाहिए।क्योंकि बाहर भेजने के साथ हॉस्टल, पीजी, अतिरिक्त खर्च और परिवार से दूरी भी जुड़ती है।

*जब दूसरे शहरों के बच्चे जबलपुर पढ़ने आते हैं, तो हमारे बच्चे बाहर क्यों?*

सिंगरौली, रीवा, सतना, नरसिंहपुर, सिवनी, बालाघाट और आसपास के क्षेत्रों से बच्चे शिक्षा के लिए जबलपुर आते हैं।
रॉबर्टसन कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, कृषि महाविद्यालय और विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं ने वर्षों तक देश को प्रतिभाएं दी हैं। आज भी जबलपुर में मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, नर्सिंग, होटल मैनेजमेंट सहित अनेक क्षेत्रों में शिक्षा के विकल्प मौजूद हैं।

*तो फिर यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—*

अधिवक्ता पंकज दुबे एवं कारोबारी दीपक सेठी ने कहा जब छोटे शहरों और जिलों के बच्चे पढ़ने के लिए जबलपुर आ रहे हैं, तो जबलपुर के बच्चे हर हाल में बाहर क्यों जाएं?

पढ़-लिखकर रोजगार लेने ही क्यों जाएं?

हम अपने बच्चों को वर्षों तक पढ़ाते हैं ताकि वे किसी दूसरे शहर में जाकर रोजगार प्राप्त करें।लेकिन समय बदल रहा है।क्यों न हमारा युवा रोजगार लेने वाला ही नहीं, रोजगार देने वाला बने?*क्यों न वह अपनी शिक्षा, प्रतिभा और अनुभव का उपयोग जबलपुर में कोई व्यवसाय, स्टार्टअप, उद्योग, प्रशिक्षण केंद्र या नई पहल शुरू करने में करे?
बाहर जाना गलत नहीं है, लेकिन बाहर जाकर सफल होने के बाद अपनी जड़ों से जुड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

*बच्चे बाहर, घर में सिर्फ माता-पिता*

बच्चों के भविष्य के लिए माता-पिता बड़ा घर बनाते हैं। बच्चे पढ़ाई के लिए बाहर जाते हैं, फिर नौकरी के लिए दूसरे शहर और कभी विदेश चले जाते हैं।

पीछे रह जाता है वही घर—जिसे बच्चों के लिए बनाया गया था।उम्र बढ़ने पर माता-पिता को स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों में सहायता की आवश्यकता होती है, जबकि बच्चे हजारों किलोमीटर दूर होते हैं।इसलिए सफलता की परिभाषा पर भी हमें विचार करना होगा। क्या सफलता केवल शहर छोड़ने का नाम है?

*जबलपुर की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं*

सरकार से विकास की अपेक्षा स्वाभाविक है, लेकिन शहर बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।
जबलपुर से बाहर जाकर सफल हुए लोग यदि अपनी जड़ों से जुड़कर यहां उद्योग, छोटे व्यवसाय, आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र और स्तरीय शिक्षा के अवसर बनाने में योगदान दें, तो शहर में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।साथ ही हमारी शिक्षण संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को भी फैकल्टी, गुणवत्ता, आधुनिक पाठ्यक्रम और रोजगारपरक शिक्षा पर गंभीरता से काम करना होगा।

*जबलपुर को “रिटायर्ड लाइफ स्टाइल” वाला शहर न बनने दें*
हमें ऐसा जबलपुर चाहिए जहां युवा पढ़ें भी, रोजगार पाएं भी, रोजगार दें भी और अपने शहर में अपना भविष्य देखें भी।शहर से बाहर जाना अवसर हो सकता है, लेकिन यह धारणा कि “सफल होने के लिए जबलपुर छोड़ना ही पड़ेगा”, इस सोच पर अब गंभीर मंथन जरूरी है।

*अभी नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी*

यह किसी एक परिवार या संस्था का सवाल नहीं है। यह जबलपुर की आने वाली पीढ़ी और शहर के भविष्य का सवाल है।हमें आज ही सोचना होगा कि आने वाला जबलपुर ऐसा न हो जहां युवा पीढ़ी बाहर चली जाए और पीछे केवल बुजुर्ग रह जाएं।जबलपुर को केवल रहने का शहर नहीं, बल्कि युवाओं के सपनों, शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता का शहर बनाना होगा।*मंथन आज करना होगा—क्योंकि अगर अभी नहीं जागे, तो बहुत देर हो चुकी होगी।*