जबलपुर। शहर में त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है और डीजे की समस्या यहां अब विकराल रूप ले चुकी है। गणेश उत्सव के बाद अब दशहरा की तैयारियां शुरू होंगी और इसी के साथ सड़कों से लेकर पंडालों तक एक-एक जुलूस में 25-25, 50-50 साउंड बॉक्स लगाकर फुल स्पीड में डीजे बजाया जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी बिना डीजे के किसी भी धार्मिक आयोजन की कल्पना ही नहीं कर पाती, लेकिन यही डीजे अब परंपरा से आगे बढ़कर मासूम बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों की जान पर बन आया है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठंडे बस्ते में…………..
डीजे को लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका लंबित है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि रात 10 बजे के बाद डीजे नहीं बजाया जा सकता। इसके बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। कोर्ट के आदेश किताबों में कैद हैं, सड़कों पर बेअसर नजर आ रहे हैं।
बैठकों और कागजों तक सीमित शर्तें……..
शांति समिति की बैठकों में हर साल तय होता है कि कितने साइज का बॉक्स रखा जाएगा और कितनी आवाज में डीजे बजेगा, प्रतिबंध का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की बात भी कही जाती है। लेकिन जबलपुर में हकीकत इससे कोसों दूर है — एक-एक जुलूस के पीछे 25-25, 50-50 साउंड बॉक्स कतार में लगाकर फुल स्पीड में बजाए जा रहे हैं, जबकि चेतावनियां तो खूब दी जाती हैं, कार्रवाई शायद ही कभी होती है। यही ढिलाई हर साल इस समस्या को और बड़ा बना देती है।
संवेदनशीलता की आड़ में पुलिस की चुप्पी……….
सीधे धार्मिक आयोजनों से जुड़े मामलों में पुलिस हस्तक्षेप से बचती नजर आती है, वजह साफ है— कानून व्यवस्था बनाए रखने की मजबूरी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या संवेदनशीलता की आड़ में हर साल आम लोगों की सेहत और जिंदगी को दांव पर लगाया जाता रहेगा? समाधान खोजना ही होगा, टालना कोई विकल्प नहीं है।
हार्ट पेशेंट से लेकर मासूम बच्चों तक, डीजे की मार……….
डीजे की तेज बेस की धमक हार्ट पेशेंट्स के लिए कई बार जानलेवा साबित हुई है, कमजोर दिल वालों की धड़कनें असामान्य रूप से बढ़ जाती हैं। दूसरी तरफ मासूम बच्चों के कान के पर्दों को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा बना रहता है। यह सिर्फ शोर नहीं, सीधा स्वास्थ्य पर हमला है।
सिर्फ चेतावनी से नहीं चलेगा काम…….
जब तक तय सीमा से ज्यादा बेस वाले स्पीकर और ट्वीटर बनना बंद नहीं होंगे, जमीन पर प्रतिबंध बेअसर ही साबित होगा। गाड़ियों में मॉडिफाइड साइलेंसर बनाने वाली कंपनियों पर भी इसी तर्ज पर सख्ती जरूरी है — जब बाजार में माल बिकेगा ही नहीं, तभी लोग खरीदना बंद करेंगे। चोट सीधे उत्पादन पर होनी चाहिए, तभी असरदार रोक संभव है।
त्योहारी सीजन दस्तक दे चुका है और गणेश पंडालों से लेकर सड़कों तक डीजे की गूंज सुनाई देने लगी है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह सिर्फ कागजी शर्तों और चेतावनियों तक सीमित न रहे, बल्कि निर्माण स्तर पर सख्ती और मैदानी कार्रवाई सुनिश्चित करे — वरना हर साल की तरह इस बार भी उत्सव की धूम किसी की जान पर भारी पड़ सकती है।