“हा राम… कहते-कहते दशरथ ने त्यागे प्राण, गढ़ा रामलीला में दशरथ मरण, भरत आगमन और चित्रकूट प्रसंग का भावपूर्ण मंचन;

जबलपुर। पिता-पुत्र के असीम प्रेम, भ्रातृभक्ति और त्याग की अनुपम गाथा जब मंच पर जीवंत हुई, तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। श्री रामलीला समिति गढ़ा जबालीपुरम के सिद्ध मंच पर भगवान श्रीराम की मानव लीला के अंतर्गत महाराज दशरथ मरण, भरत आगमन एवं चित्रकूट प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया। इन मार्मिक प्रसंगों ने उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्रीराम के पूजन-अर्चन एवं आरती के साथ हुआ। समिति संचालक पंडित अशोक मनोध्याय, अध्यक्ष एवं निर्देशक राजेश मिश्रा, महामंत्री एडवोकेट अरुण दीक्षित सहित सीताराम दुबे, मथुरा प्रसाद जैन ‘उत्साही’, श्रीमती नूतन जैन, गुड्डा त्रिपाठी, विकास गौतम, ठाकुर मनोज सिंह, प्रमोद तिवारी, लाखन सिंह, राकेश पाठक, लोकराम कोरी, विजय नेमा, कैलाश नेमा, पंकज अवस्थी, अशोक बघेल ‘दादा भाई’ एवं मदन गोपाल पटेल ने भगवान का माल्यार्पण कर भोग अर्पित किया तथा आरती की।

60 वर्षों से रामलीला की सेवा कर रहे सीताराम दुबे सम्मानित………………………

श्री रामलीला समिति के सिद्ध मंच पर रामलीला परिवार को लगभग 60 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे समिति के स्थायी सदस्य सीताराम दुबे का सम्मान किया गया। समिति संचालक पंडित अशोक मनोध्याय एवं अन्य पदाधिकारियों ने उनके दीर्घकालीन योगदान की सराहना करते हुए उन्हें शाल, श्रीफल एवं प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर उनके समर्पण और रामलीला के प्रति उनकी निष्ठा को याद किया गया।

 “राम… राम… हा राम!” पुकारते हुए दशरथ ने त्यागे प्राण………………………..

मंचन के दौरान सुमंत्र ने महाराज दशरथ को बताया कि तमाम प्रयासों के बावजूद भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता वन से वापस नहीं लौटे हैं। पुत्र वियोग की पीड़ा से व्याकुल महाराज दशरथ ने “राम… राम… हा राम!” पुकारते हुए अपने प्राण त्याग दिए। इस हृदयविदारक दृश्य ने रामलीला मैदान में शोक का वातावरण निर्मित कर दिया और अनेक दर्शक भावुक हो उठे।

दूसरी ओर, महर्षि वाल्मीकि के मार्गदर्शन में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में निवास करने लगे। ननिहाल से लौटे भरत को जब श्रीराम के वनगमन और महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिला, तो वे गहरे शोक में डूब गए।

भरत ने राजसिंहासन ठुकराकर प्रस्तुत की भ्रातृभक्ति की मिसाल……………

गुरु वशिष्ठ द्वारा अयोध्या का राजसिंहासन स्वीकार करने का आग्रह किए जाने पर भरत ने राज्य संभालने से इनकार कर दिया। उनके हृदय में अपने बड़े भाई भगवान श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान था। भरत की भावना—“देखे बिन रघुनाथ पद, जिय की जरन न जाए”—ने उनके त्याग, समर्पण और अनन्य भ्रातृप्रेम को सजीव रूप में प्रस्तुत किया।

इसके बाद भरत अपनी माताओं, गुरुजनों और अयोध्या की प्रजा के साथ भगवान श्रीराम को वापस अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट पहुंचे। भरत के चरित्र के माध्यम से मंचन ने संदेश दिया कि सत्ता और राजसुख से कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रेम, मर्यादा, त्याग और कर्तव्य हैं। इसके उपरांत जयंत तथा महर्षि अत्रि-अनसूया के प्रसंगों का भी रोचक मंचन किया गया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

 बड़ी संख्या में रामभक्त रहे उपस्थित…………………….

इस अवसर पर राजेंद्र प्यासी, हरीश मनोध्याय, संजय तिवारी, रमाशंकर कटारे, राजेश नेमा, विनायक तिवारी, डॉ. नीना उपाध्याय, विद्या केवट, हनुमंत सिंह रघुवंशी, भूपेंद्र उपाध्याय, गणपत कोष्टा, सुजीत साहू, अरुण दीक्षित एवं व्यास माधव दुबे सहित बड़ी संख्या में रामभक्त उपस्थित रहे।

 15 अक्टूबर को होगा सीता हरण प्रसंग का मंचन………

समिति के अनुसार, गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को शूर्पणखा चरित्र, खर-दूषण वध एवं सीता हरण की रोचक लीला का मंचन किया जाएगा। समिति ने सभी धर्मप्रेमी नागरिकों एवं रामभक्तों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर भगवान श्रीराम की लीला का दर्शन करने तथा पुण्य लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया है।