जबलपुर का नाम ‘ओशोपुरम’ करने की मांग, अनुयायियों ने बताया विश्वस्तरीय पहचान का अवसर

जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर का नाम बदलकर ‘ओशोपुरम’ करने की मांग उठने लगी है। ओशो अनुयायियों का कहना है कि आचार्य रजनीश ने अपने जीवनकाल का सबसे अधिक समय जबलपुर में बिताया। विद्यार्थी जीवन से लेकर प्राध्यापक के रूप में कार्य करने तक उनकी अनेक स्मृतियां इस शहर से जुड़ी हैं। ऐसे में जबलपुर को ओशो के नाम से नई पहचान दी जानी चाहिए। ओशो होम आश्रम के स्वामी श्रीला प्रेम पारस सहित शहर के ओशो अनुयायियों ने इस मांग का समर्थन किया है।स्वामी श्रीला प्रेम पारस का कहना है कि ओशो के अनुयायी देश-विदेश में फैले हुए हैं और जबलपुर से जुड़ी उनकी स्मृतियां लोगों को यहां आने के लिए आकर्षित करती हैं। देवताल, भंवरताल और महाकौशल कॉलेज जैसे स्थानों से ओशो की यादें जुड़ी हैं। इन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग जबलपुर पहुंचते हैं। ओशो होम आश्रम में भी देश-विदेश से आने वाले लोग आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करते हैं। उनका मानना है कि शहर का नाम ओशोपुरम होने से जबलपुर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिल सकती है। उन्होंने कहा कि ओशो जैसा ब्रांड एंबेसडर इस शहर को अगले 100 वर्षों में मिलना मुश्किल है।

**जबलपुर में बीते जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष**

ओशो के करीबी रहे स्वामी अगेह भारती के अनुसार, वे ओशो के संन्यास देना शुरू करने से चार वर्ष पहले से उनके शिष्य रहे हैं। उनका कहना है कि जबलपुर का नाम ओशोपुरम होने से यह शहर काशी, वृंदावन और अयोध्या की तरह आध्यात्मिक पहचान प्राप्त कर सकता है। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और शहर का सम्मान विश्वभर में बढ़ेगा।

ओशो के जीवन से जुड़े विवरणों के अनुसार, उन्होंने अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष जबलपुर में बिताए। यहां उन्होंने विद्यार्थी और प्राध्यापक के रूप में समय गुजारा। उनके अनुयायियों का मानना है कि जबलपुर के साथ उनका जुड़ाव केवल व्यक्तिगत स्मृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर उनकी वैचारिक और आध्यात्मिक यात्रा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

**देश-दुनिया में फैले हैं ओशो के अनुयायी**

ओशो ने हिंदी और अंग्रेजी में अपने विचारों के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया। उनके प्रवचन, पुस्तकें और ध्यान पद्धतियां आज भी देश-विदेश में लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। अनुयायियों का मानना है कि जबलपुर का नाम ओशोपुरम रखने से ओशो से जुड़े ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थलों के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और पर्यटन विकास को नई दिशा मिल सकती है।ओशो के नाम से शहर की पहचान स्थापित करने की मांग के समर्थन में फिल्म जगत से जुड़े लोगों का भी उल्लेख किया जा रहा है। अनुयायियों का कहना है कि इस पहल से संस्कारधानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आध्यात्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।