बरगी के चौथई गांव में तेंदुए का आतंक,

जबलपुर। जिले के बरगी वन परिक्षेत्र के चौथई गांव में पिछले चार महीनों से तेंदुए की लगातार मौजूदगी अब केवल वन्यजीव गतिविधि का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर जन सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गया है। हालात ऐसे हैं कि सूर्यास्त होते ही पूरा गांव सन्नाटे में डूब जाता है। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं, जबकि किसान खेतों तक जाने में भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।बरगी वन परिक्षेत्र की धनगवां बीट से लगे इस आदिवासी बहुल गांव में तेंदुआ अब तक कई पालतू मवेशियों को अपना शिकार बना चुका है। बसोर सिंह और पर्वत सिंह के बछड़ों समेत अन्य पशुओं की मौत से ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा है। हाल ही में तेंदुआ गांव के बुजुर्ग गुमान सिंह और मंगो बाई के खेत पर बने घर तक पहुंच गया और पालतू कुत्ते को उठाने का प्रयास किया। परिवार के लोगों के शोर मचाने पर वह जंगल की ओर भाग गया। इस घटना के बाद पूरे गांव में भय का माहौल और गहरा गया है।ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार वन विभाग और प्रशासन को सूचना दी, लेकिन अब तक न तो प्रभावी रेस्क्यू अभियान चलाया गया और न ही निगरानी के लिए कोई स्थायी व्यवस्था की गई। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो कभी भी कोई बड़ी जनहानि हो सकती है।

पूरे जिले में बढ़ रहा खतरा

तेंदुओं की सक्रियता अब केवल चौथई तक सीमित नहीं है। बरगी, सिहोरा, पाटन, खमरिया, डुमना, मझौली, कटंगी और आसपास के वन क्षेत्रों में 30 से अधिक तेंदुओं की मौजूदगी बताई जा रही है। गौरहा बीट में भी लगातार मूवमेंट दर्ज किया गया है। गौरहा और चौथई के बीच महज तीन किलोमीटर की दूरी होने से तेंदुओं का गांवों और खेतों की ओर आना-जाना बढ़ गया है।

राज्य वन अनुसंधान संस्थान की लेपर्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में जबलपुर के शहरी क्षेत्र में 17 तेंदुओं की मौजूदगी दर्ज की गई थी। पिछले तीन वर्षों में इनकी संख्या लगभग दोगुनी होने का अनुमान है। जीसीएफ, खमरिया, तिघरा, ट्रिपल आईटी, डुमना, नयागांव सहित ग्रामीण अंचलों में भी तेंदुओं की गतिविधियां लगातार सामने आ रही हैं। फिलहाल किसी व्यक्ति पर हमला दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन लगातार बढ़ती मौजूदगी भविष्य में बड़े खतरे की आशंका को मजबूत कर रही है।

जन सुरक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि वन विभाग को संवेदनशील गांवों में नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप, त्वरित रेस्क्यू टीम, ग्रामीणों के लिए अलर्ट सिस्टम और जनजागरूकता अभियान तत्काल शुरू करना चाहिए। ग्रामीणों का कहना है कि वे वन्यजीव संरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।