करवा चौथ के साथ तीज का व्रत भी रखती हैं विशाखा गुप्ता और श्वेता अरोड़ा, ससुराल में मिला मायके की परंपराओं को निभाने का सम्मान

जबलपुर भारतीय संस्कृति की खूबसूरती उसकी विविध परंपराओं में ही नहीं, बल्कि उन रिश्तों में भी झलकती है, जो एक-दूसरे की आस्था और भावनाओं को सम्मान देकर और मजबूत बनते हैं। विवाह के बाद अक्सर महिलाएं अपने ससुराल की रीति-रिवाजों को अपनाती हैं, लेकिन जब उन्हें मायके से मिली परंपराओं को भी उसी सहजता से निभाने का अवसर मिलता है, तो पारिवारिक सामंजस्य की एक खूबसूरत मिसाल सामने आती है। करवा चौथ के अवसर पर विशाखा गुप्ता और श्वेता अरोड़ा की कहानी इसी आपसी सम्मान, प्रेम और विश्वास का संदेश देती है।

ससुराल की परंपरा भी, मायके की आस्था भी

हिंदू परिवार में पली-बढ़ीं विशाखा गुप्ता का विवाह पंजाबी परिवार में हुआ। वह अपने ससुराल की परंपरा के अनुसार करवा चौथ का व्रत रखती हैं। इसके साथ ही बचपन से अपनी मां को पति की दीर्घायु की कामना के लिए तीज का व्रत रखते हुए देखती आई हैं। मां से मिली इसी सीख और आस्था को आगे बढ़ाते हुए वह तीज का व्रत भी रखती हैं।
विशाखा बताती हैं कि उनके ससुराल वालों ने उनकी भावनाओं को समझा और दोनों परंपराओं को निभाने की पूरी स्वतंत्रता दी। उनके लिए ये व्रत महज धार्मिक रस्में नहीं, बल्कि जीवनसाथी के प्रति प्रेम, विश्वास और मंगलकामना की अभिव्यक्ति हैं। उनका मानना है कि जब उद्देश्य पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना हो, तो अपनी आस्था के अनुसार व्रत रखने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

मायके की परंपरा को ससुराल ने भी अपनाया

पंजाबी परिवार में पली-बढ़ीं श्वेता अरोड़ा का विवाह अग्रवाल परिवार में हुआ। वह ससुराल की परंपरा के अनुसार तीज का व्रत रखती हैं, वहीं बचपन से मां को करवा चौथ का व्रत करते देखकर उन्होंने इस परंपरा को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाया।श्वेता के मुताबिक, उनके ससुराल वालों ने कभी उनकी इस आस्था पर आपत्ति नहीं की, बल्कि उन्हें अपनी पारिवारिक परंपरा जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। खास बात यह है कि उनकी सास भी अब उनके साथ करवा चौथ का व्रत रखने लगी हैं। इस तरह मायके से मिली परंपरा केवल श्वेता तक सीमित नहीं रही, बल्कि ससुराल में भी अपनत्व और सहभागिता का माध्यम बन गई।श्वेता मानती हैं कि पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना से जुड़े दोनों व्रत उनके लिए आस्था और संकल्प का प्रतीक हैं। करवा चौथ महिलाओं को सजने-संवरने, नए वस्त्र पहनने और श्रृंगार करने का अवसर भी देता है। वहीं, व्रत उनके लिए मानसिक दृढ़ता और जीवनसाथी के प्रति समर्पण की भावना से जुड़ा है।

परंपराओं का सम्मान, रिश्तों की असली खूबसूरती

विशाखा और श्वेता के अनुभव बताते हैं कि विवाह के बाद ससुराल की परंपराएं अपनाने का अर्थ मायके से मिली आस्था को छोड़ देना नहीं है। परिवार में यदि आपसी समझ, सम्मान और स्वतंत्रता हो, तो अलग-अलग रीति-रिवाज टकराव का कारण बनने के बजाय रिश्तों को और गहरा बना सकते हैं।करवा चौथ जैसे त्योहार प्रेम, विश्वास और जीवनसाथी के मंगल की कामना से जुड़े हैं। जब परिवार इन भावनाओं को समझते और सम्मान देते हैं, तो त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाते, बल्कि परिवारों को जोड़ने और आपसी रिश्तों में मिठास घोलने का माध्यम बन जाते हैं।

स्थानीय बाजारों से खरीदारी करें, अपने शहर के रोजगार को दें मजबूती: दीपक सेठी

त्योहारों की खुशियों को स्थानीय व्यापार और रोजगार से जोड़ने का संदेश देते हुए दीपक सेठी ने कहा कि भारतीय त्योहारों की असली खूबसूरती विविधता, पारिवारिक एकता और एक-दूसरे की आस्था के सम्मान में है। परिवारों में जब महिलाओं को अपनी परंपराओं और भावनाओं के अनुसार त्योहार मनाने की स्वतंत्रता मिलती है, तो आपसी विश्वास और रिश्तों की मजबूती बढ़ती है।उन्होंने लोगों से अपील की कि करवा चौथ सहित सभी त्योहारों पर खरीदारी अपने मोहल्ले की दुकानों और शहर के स्थानीय बाजारों से करें। साथ ही मेड इन इंडिया उत्पादों को प्राथमिकता दें, ताकि स्थानीय व्यापारियों को प्रोत्साहन मिले, देश में रोजगार के अवसर बढ़ें और स्वदेशी उत्पादों को मजबूती मिले।दीपक सेठी के अनुसार, “अपना शहर, अपना व्यापार, अपना रोजगार केवल एक नारा नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का संकल्प है। त्योहारों पर स्थानीय बाजारों से खरीदारी कर हर नागरिक अपने शहर के व्यापारियों, कारीगरों और रोजगार से जुड़े लोगों की खुशियों में भागीदार बन सकता है।