जबलपुर। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने जबलपुर प्रवास के दौरान देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों, जेन-जी के आंदोलन और निर्वाचन व्यवस्था को लेकर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को नई पीढ़ी के शांतिपूर्ण और निष्कपट युवाओं की बात सुननी चाहिए। युवाओं से टकराव की स्थिति सरकार के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
शंकराचार्य ने युवाओं के आंदोलन को उनके भीतर मौजूद पीड़ा और असंतोष की अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह पैर में कांटा चुभने पर बच्चा अपनी पीड़ा व्यक्त करता है, उसी तरह नई पीढ़ी भी अपनी व्यथा और समस्याओं को सामने रख रही है। ऐसे में सरकार को युवाओं की जायज मांगों को समझकर उनके समाधान की दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।
आंदोलन को दबाने के बजाय संवाद जरूरी…………
उन्होंने कहा कि यदि युवाओं के आंदोलन को दबाने या अनावश्यक रूप से लंबा खींचने का प्रयास किया गया तो इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं। उन्होंने वर्ष 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौर के आंदोलन से आगे चलकर अनेक राजनीतिक नेतृत्व उभरकर सामने आए थे। शंकराचार्य ने महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लंबे समय से छात्र संघ चुनाव नहीं होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को लोकतांत्रिक और राजनीतिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाने के अवसर मिलना चाहिए। युवाओं की ऊर्जा और उनकी बातों को दबाने के बजाय उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थान दिया जाना चाहिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल हटाया जाए…………
निर्वाचन व्यवस्था को लेकर भी शंकराचार्य ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेदों का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल पद से हटाने की मांग की। उन्होंने कहा कि निर्वाचन प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता जरूरी है और नई नियुक्ति भी पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन संस्थाओं की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों और मतभेदों का समाधान पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए।