जबलपुर । जबलपुर संभाग के तथा मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल मंडला जिला के हरे-भरे पहाडिय़ों और नर्मदा नदी के शांत बहाव के समीप बसा बबैहा गांव अपने भीतर एक अनोखी कहानी समेटे हुए है। यह कहानी सिर्फ एक गर्म पानी के कुंड की नहीं, बल्कि समय, तपस्या और प्रकृति के अदभुत संगम की है। कहते हैं कि सदियों पहले, जब इस पूरे क्षेत्र में घने जंगलों का साम्राज्य था और मानव जीवन अभी प्रकृति की गोद में ही सांस ले रहा था, तब यहाँ एक महान तपस्वी ऋषि ने अपना आश्रम बनाया। वे साधारण ऋषि नहीं थे, उनकी तपस्या में इतनी शक्ति थी, कि वे अग्नि के बीच बैठकर वर्षों तक ध्यान करते रहे। दिन-रात, गर्मी-सर्दी, बारिश कुछ भी उनकी साधना को डिगा नहीं सका। धीरे-धीरे उनकी तपस्या का प्रभाव प्रकृति पर दिखने लगा। आसपास की जमीन गर्म होने लगी, पेड़ों की पत्तियाँ हल्की भाप से सरसराने लगीं, और वातावरण में एक अनोखी ऊर्जा फैल गई। ऐसा लगता था मानो धरती स्वयं उनकी तपस्या का हिस्सा बन गई हो। एक दिन, जब उनकी साधना अपने चरम पर पहुँची, तो आकाश में दिव्य प्रकाश फैला और देवता प्रकट हुए। उन्होंने ऋषि से वरदान माँगने को कहा। ऋषि ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, बल्कि इस धरती के लिए प्रार्थना की ‘हेदेव! यह स्थान ऐसा बन जाए जहाँ आने वाला हर व्यक्ति अपनी पीड़ा, रोग और मानसिक बोझ से मुक्त हो सके। ऋषि की निस्वार्थ भावना से प्रसन्न होकर देवताओं ने वरदान दिया। उसी क्षण धरती हिली, एक हल्की गर्जना हुई, और जमीन फट गई। उस दरार से गर्म जल का एक स्रोत फूट पड़ा—ऐसा जल जो सामान्य नहीं था। उसमें अद्भुत औषधीय गुण थे, जो शरीर की थकान व चर्म रोग को मिटा देते और मन को शांति प्रदान करते। समय बीतता गया, जंगलों ने रास्ते दिए, गाँव बसे, और दुनिया बदलती रही। लेकिन वह कुंड आज भी वहीं है, बबैहा गांव में, बरगी बांध के बैकवॉटर क्षेत्र के पास, अपनी गर्माहट और रहस्य को संभाले हुए। सुबह के समय जब कुंड से भाप उठती है और सूरज की पहली किरणें उस पर पड़ती हैं, तो दृश्य किसी दिव्य लोक जैसा प्रतीत होता है। लोग दूर-दूर से यहाँ आते हैं, कुछ विज्ञान की जिज्ञासा लेकर, तो कुछ आस्था का विश्वास लेकर। वैज्ञानिक इसे भू-तापीय ऊर्जा का परिणाम मानते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह आज भी उस ऋषि की तपस्या का जीवंत प्रतीक है। कहानी यह भी कहती है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से यहाँ स्नान करता है, वह सिर्फ अपने शरीर की थकान ही नहीं, बल्कि जीवन की उलझनों से भी हल्का होकर लौटता है। विशेष रूप से चर्म रोग उस पानी के संपर्क में आते ही दूर हो जाता है। दूर-दूर से लोग इस कुंड में स्नान के लिए आते हैं और चर्म रोग से मुक्ति पाते हैं। मानो उस गर्म जल में आज भी ऋषि की साधना की ऊर्जा बह रही हो। जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कुंड का जीर्णोद्धार किया है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था, रोग निवारण और पर्यटन का एक अद्भुत नजारा पेश करता है, क्योंकि गर्म कुंड नर्मदा की अथाह जल राशि के बीच है, जहां बोटिंग की सुविधा भी है। कुंड के आस-पास बैक वॉटर व घने जंगलों के बीच वन्य प्राणियों का विचरण एक अलग ही आकर्षण पैदा करते हैं। मंडला का यह रहस्यमयी कुंड मंडला-जबलपुर मार्ग पर मंडला से 18 किलोमीटर जबलपुर की ओर है। यह गर्म कुंड प्रकृति की सिर्फ दृश्य नहीं, अनुभव है और हर अनुभव के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी होती है, जो हमें खुद को इस संसार से जोड़ती है।