रविन्द्र नाथ टैगोर अपनी माता पिता की चौदहवीं संतान थे, अंबेडकर जी भी अपनी माता पिता की चौदहवीं संतान थे, सुभाष चंद्र बोस चौदह भाई बहन मै नौवीं संतान थे, स्वामी विवेकानंद भी नौवी संतान थे । इस विवेचना का तात्पर्य मात्र इतना है कि कई बच्चों मै से एक बच्चा महापुरुष बनता है किन्तु जहां मात्र एक बच्चा हो उससे हमें अधिक उम्मीद करने की जरूरत नहीं ,कुछ अपवाद भी हैं गांधारी और धृतराष्ट्र की सौ संताने थीं इसके बाद भी वे महाभारत के युद्ध में कुछ नहीं कर पाए ।
आज सामाजिक समरसता के चलते ,जातियों के घाल मेल के कारण , जाति विहीन मानव समाज की कल्पना अब साकार हो रही है ।शाकाहारी की जोड़ी ,मांसाहारी से ,पंडित की जोड़ी , लाला से,डॉक्टर की जोड़ी वकील से , अमीर की जोड़ी फकीर से सेट हो रही है ।इस विवाह के सीजन में अभी तक जितने आमंत्रण पत्र प्राप्त हुए ,सभी अंतरजातीय विवाह संबंध के रहे ।किसी को पता न चले इस दहशत में पहले युवा ,कोर्ट मैरिज करते थे ।अब वे बेखौफ अन्य समाज की ,अपनी पसंद की लड़की से शादी करते हैं। मां _ बाप खुशी खुशी ,या बगैर खुशी के ,खुश होने का नाटक करते हैं।अब मां _ बाप समझदार हो गए हैं,लव मैरिज ,अरेंज मैरिज में तब्दील हो गई है । यहां तक तो ठीक है , लिव इन रिलेशन के चलते बिना विवाह के मां बनने की घटनाएं ,अब बढ़ गई हैं ।वहीं दूसरी ओर बहुत से नौकरी पेशा युगल दंपत्ति इतने व्यस्त हैं कि उन्हें संतानोत्पत्ति झंझट वाला काम समझ में आता है ।इस सबके चलते , किराए की कोख तथा बच्चों को गोद देने वाली संस्थाओं की पूंछ परख बढ़ गई है ।परिवार के बुजुर्गों को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं । उनके जमाने में जन धन से भरा परिवार होता था ।बच्चों के मामले में बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी ।खूब कमरों वाला मकान होता था,एक कमरा प्रसव कक्ष के लिये होता था ।जहां से निरंतर किलकारियां या नवजात शिशु के रोने की आवाज आती थी ।संयुक्त परिवार थे ,इतनी सुविधाएं नहीं थी ,कोई कोई बच्चा बाल्यावस्था में ,गुजर जाए तो ,ज्यादा ग़म नहीं होता था ।
आज तो एक बच्चा,या बच्ची ।सिंगल प्वाइंट कनेक्शन ।घर में कोई बीमार पड़ जाए,अस्पताल में भर्ती हो जाय ,कोई मुसीबत की घड़ी आ जाय तो दूर दूर तक सहारा देने वाला नहीं ।तब छोटा परिवार ,सुखी परिवार का यह मंत्र धोखा लगता है । दुःख,संकट,मुसीबत की घड़ी में ,कम संतान, दुखी इंसान ,वाली बात ,समझ में आती है ।
आज घरों में सिंगल बच्चा बड़े नाजों से पाला जाता है ।
मोबाइल के बिना खाना नहीं खाता है ।माता पिता के आंख दिखाने पर गुर्राता है ।आप उसे मारना तो दूर , डांट भी नहीं सकते ।नर्सरी , के जी 1,2 में सभी बच्चे स्कूल कार से आ रहे हैं ।बच्चों के बाप की नए मॉडल की कार खरीदने और दिखाने में बड़ी दिलचस्पी है ।उन्हें लगता है कि बच्चा अगर कार से स्कूल नहीं गया तो कलेक्टर नहीं बन पाएगा सोसायटी में दिखावे का बोलबाला है, पहले पांच ,सात। साल के बच्चे नंगे ,ज्यादा हुआ तो चड्डी पहिनकर शहर का चक्कर लगाने की हिम्मत रखते थे ।आज तीन साल का बच्चा भी बिना जींस पेंट के घर के बाहर नहीं निकलता ।खाने में उनकी रुचि चाईनीज, इटालियन, सी फूड आदि, रोटी, दाल, चांवल के नाम से बुखार आ जावे ।टिफिन में रोज बदल बदल कर नाश्ता , स्कूल पढ़ाई के नहीं , खाद्य सामग्री के व्यंजन मेला हो गए हैं ।मम्मी बच्चों को छोड़ने स्कूल आती हैं,आज सज धज में वे किसी से कम नहीं ।स्कूल के पास गेट पर जब माताएं एकत्र होती हैं तो लगता है जैसे अघोषित सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही है । आज एक बच्चे के लिए मां बाप सब कुछ न्यौछावर कर रहे है,यह जानते हुए भी कि अच्छे जॉब और भविष्य की खातिर बच्चा बड़ा होकर उनसे दूर बहुत दूर चला जाएगा ,हो सकता है ,अंतिम संस्कार में न आ पाए ।अब घर भुतहा घर हो गए हैं,जिनमें एक बुजुर्ग दंपत्ति या घर की देख रेख के लिए एक चौकीदार है ।काश परिवार में और संताने होती ।