जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व : डॉ यतीश जैन

जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार ग्रहण की घटना से यह दिवस गहराई से संबद्ध है।जैन आगमिक परंपरा में वर्णित है कि भगवान ऋषभदेव ने जब राज्य, ऐश्वर्य और समस्त भौतिक संसाधनों का त्याग कर दीक्षा धारण की, तब वे पूर्ण वैराग्य के साथ तप और ध्यान में लीन होकर विहार करने लगे। उनके जीवन का यह चरण पूर्णतः परिग्रह-शून्यता, इन्द्रियनिग्रह और आत्मानुशासन का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने संसार से विमुख होकर आत्मा की शुद्धि के लिए कठोर साधना का मार्ग अपनाया।
              दीक्षा के पश्चात जब वे आहार ग्रहण हेतु निकले, तब उस समय समाज में साधुओं को आहार देने की विधि का अभाव था। लोग श्रद्धा से प्रेरित होकर उन्हें विभिन्न भौतिक वस्तुएँ – जैसे स्वर्ण, रत्न, वस्त्र आदि अर्पित करते थे, परंतु वे इन्हें स्वीकार नहीं करते थे। कारण यह था कि मुनि जीवन में केवल निर्दोष, जीवदया से युक्त, मर्यादित और उचित विधि से प्रदान किया गया आहार ही स्वीकार्य होता है। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने निरंतर तेरह माह तक उपवास किया। यह तप केवल शारीरिक सहनशक्ति का नहीं, बल्कि मन, वचन और काया की पूर्ण शुद्धि का प्रतीक था।
            इस प्रसंग का अत्यंत विस्तृत वर्णन आदिपुराण तथा महापुराण में प्राप्त होता है। इन ग्रंथों में भगवान ऋषभदेव के इस दीर्घकालीन उपवास को असाधारण तप बताया गया है, जो कर्म-निर्जरा का सशक्त साधन है। तत्त्वार्थ सूत्र में प्रतिपादित सिद्धांत
“तपसा निर्जरा च”
इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि तप के द्वारा कर्मों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होती है।
            तेरह माह के उपवास के पश्चात वह पावन अवसर आया जब हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस कुमार को जातिस्मरण ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस ज्ञान के प्रभाव से उन्हें यह स्मरण हुआ कि साधुओं को किस प्रकार शुद्ध और विधिपूर्वक आहार प्रदान किया जाता है। उन्होंने भगवान ऋषभदेव को इक्षु रस अर्पित किया, जो पूर्णतः शुद्ध, अहिंसात्मक और मर्यादित आहार था।       भगवान ने इसे स्वीकार किया और अपना प्रथम आहार ग्रहण किया। यही घटना इस पावन तिथि पर घटित हुई, जिससे यह दिवस विशेष महत्त्व का हो गया।
              “अक्षय” का अर्थ है जिसका क्षय न हो, जो अविनाशी हो। इस संदर्भ में यह पर्व केवल बाह्य पुण्य की प्राप्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मा की उस शुद्ध अवस्था का भी संकेत देता है जहाँ कर्मों का क्षय होकर आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को प्राप्त करती है। इस दिन किया गया तप, दान और स्वाध्याय दीर्घकालिक आध्यात्मिक फल प्रदान करता है। इस पर्व का गहरा संबंध वर्षीतप से भी है। वर्षीतप एक अत्यंत कठोर साधना है, जिसमें साधक एक वर्ष तक वैकल्पिक उपवास करता है। एक दिन उपवास और दूसरे दिन मर्यादित आहार। यह साधना भगवान ऋषभदेव के तेरह माह के उपवास की स्मृति में की जाती है। इसका समापन इसी दिन “पारण” के रूप में होता है, जिसमें साधक इक्षु रस या अन्य शुद्ध आहार ग्रहण करता है। यह केवल तप का अंत नहीं, बल्कि आत्मसंयम की दीर्घ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
आहार-विधि की दृष्टि से यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन परंपरा में आहार को केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं माना गया, बल्कि यह आत्मानुशासन और जीवदया से जुड़ा हुआ है। राजा श्रेयांस कुमार द्वारा दिया गया इक्षु रस इस बात का प्रतीक है कि आहार शुद्ध भाव, सम्यक ज्ञान और उचित विधि से ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार यह घटना आहार-विधि की स्थापना का मूल आधार बनती है।
दान के संदर्भ में भी यह प्रसंग अत्यंत शिक्षाप्रद है। यहाँ दान केवल वस्तु का नहीं, बल्कि भावना का महत्व दर्शाया गया है। श्रेयांस कुमार का दान इसलिए महान माना गया क्योंकि उसमें श्रद्धा, ज्ञान और करुणा का समन्वय था। जैन सिद्धांतों के अनुसार, सम्यक भाव से किया गया दान ही वास्तविक पुण्य का कारण बनता है। यह पर्व सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें सादगी, संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश देता है। वर्तमान युग में, जहाँ भोग-विलास और उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह पर्व हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य बाहरी सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और शुद्धि है।
जैन दर्शन में आत्मा को अनंत ज्ञान, दर्शन और सुख का भंडार माना गया है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण यह स्वभाव प्रकट नहीं हो पाता। तप, संयम और साधना के माध्यम से इन कर्मों का क्षय किया जा सकता है। यह पर्व उसी मार्ग का स्मरण कराता है और प्रत्येक साधक को प्रेरित करता है कि वह आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हो।
          अक्षय तृतीया का यह संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन हैं। भगवान ऋषभदेव का आदर्श जीवन और राजा श्रेयांस  की सम्यक भावना यह दर्शाती है कि जब ज्ञान, श्रद्धा और आचरण का समन्वय होता है, तभी धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। यही इस पावन तिथि का शाश्वत और अक्षय संदेश है, जो प्रत्येक युग में समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरणादायक बना रहेगा।
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