जबलपुर। प्रदेश के सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को निजी हाथों में सौंपने के कथित प्रस्ताव को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के निजीकरण की योजना के विरोध में जन संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है।
सोमवार को जबलपुर के विभिन्न जन संगठनों ने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र भेजकर इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रस्ताव पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।
गरीब मरीजों पर बढ़ेगा बोझ………..
जन संगठनों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने के बजाय उन्हें निजी हाथों में सौंपना जनता के हितों के खिलाफ है। डॉ. पी.जी. नाजपांडे ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2025 का हवाला देते हुए कहा कि निजी अस्पतालों में इलाज का औसत खर्च 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह लगभग 6,631 रुपये है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीवनरेखा हैं, और निजीकरण से इलाज पूरी तरह महंगा और असुलभ हो जाएगा।
जिला अस्पतालों का भी होने वाला था निजीकरण…….
जन संगठनों ने बताया कि जिला अस्पतालों को भी निजी क्षेत्र का देने का प्रस्ताव पूर्व में किया गया था लेकिन जन संगठनों के आन्दोलन के कारण यह प्रस्ताव अब वापिस लिया गया है।
पहले भी वापस हुआ था प्रस्ताव………..
जन संगठनों ने यह भी दावा किया कि इससे पहले जिला अस्पतालों के निजीकरण का प्रस्ताव भी जनआंदोलन के बाद वापस लिया जा चुका है। जनसंगठनों की ओर से घनश्याम सोनकर, पी.एस. राजपूत, सुभाष चन्द्रा, सुशीला कनौजिया, गीता पाण्डेय, मनीषा साहू सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि यदि सरकार ने इस बार भी निर्णय नहीं बदला तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा। स्वास्थ्य नीति को लेकर उठे इस विरोध ने प्रदेश की राजनीति और जनस्वास्थ्य व्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है।