मन के बंधनों से आजादी ही वास्तविक मुक्ति : सतगुरु माता सुदीक्षा

जबलपुर। संत निरंकारी मिशन द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आंतरिक स्वतंत्रता और ब्रह्मज्ञान के संदेश के साथ मुक्ति पर्व मनाया गया। दिल्ली के निरंकारी सरोवर के समक्ष आयोजित मुख्य कार्यक्रम में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि वास्तविक मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार, नफरत, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में है।उन्होंने कहा कि हर सांस में परमात्मा का अहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता के साथ जीवन जीना ही जीते-जी मुक्ति है। माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मन में शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी बनाए रखनी चाहिए। संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना नहीं, बल्कि विचार और कर्म में उतारना ही वास्तविक साधना है।

इसी क्रम में जबलपुर शाखा के गोल बाजार भवन में भी मुक्ति पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। रीवा से आए प्रचारक महात्मा दर्शन लाल अरोरा ने संत विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मुक्ति पर्व के इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मुक्ति पर्व की शुरुआत वर्ष 1964 में जगत माता बुधवंती जी की स्मृति में हुई थी। बाद में यह शहंशाह-जगत माता दिवस के रूप में मनाया गया और वर्ष 1979 में इसे मुक्ति पर्व के रूप में स्थापित किया गया।कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है, उसी तरह ब्रह्मज्ञान की ज्योति मानव को अपनी वास्तविक पहचान का बोध कराकर प्रेम, सद्भाव और सकारात्मक जीवन की ओर प्रेरित करती है।