सात निराश्रित मरीजों के लिए विक्टोरिया अस्पताल ने मांगा मोक्ष आश्रय का सहारा

जबलपुर। शहर में हर व्यक्ति को सम्मान और अधिकार दिलाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बीमारी की हालत में अस्पताल पहुंचने वाले बेसहारा लोगों के लिए इलाज के बाद सुरक्षित छत का संकट आज भी बना हुआ है। सेठ गोविंददास जिला चिकित्सालय (विक्टोरिया) में इस समय सात लावारिस और निराश्रित मरीज उपचाररत हैं। पहचान और परिजनों की जानकारी नहीं होने के कारण अस्पताल प्रबंधन ने इनके लिए मोक्ष आश्रय की मदद मांगी है। वहीं मेडिकल अस्पताल के वार्ड क्रमांक 15 से भी एक लावारिस मरीज को मोक्ष आश्रय भेजा गया है।

अस्पताल प्रबंधन ने मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति के मोक्ष आश्रय के प्रमुख आशीष ठाकुर को भेजे पत्र में बताया कि समय-समय पर मानसिक रूप से अस्वस्थ, वृद्ध और परिवार द्वारा त्यागे गए मरीज सड़क, सार्वजनिक स्थानों अथवा 108 एंबुलेंस के माध्यम से अस्पताल पहुंचते हैं। अस्पताल में उपचार की सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन उपचार के बाद ऐसे मरीजों को लंबे समय तक रखने और उनकी देखभाल के लिए स्थायी आश्रय की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में स्वस्थ होने के बाद भी उनके सामने दोबारा सड़क पर लौटने का संकट खड़ा हो जाता है।

सात मरीज, किसी के पास पहचान नहीं

वर्तमान में विक्टोरिया अस्पताल में मौजूद निराश्रित मरीजों में अब्दुल मजीद (72), दो अज्ञात मरीज करीब 50 और 75 वर्ष, कल्लू केवट (55), कमलेश तिवारी (70), करीब 80 वर्षीय एक अज्ञात मरीज और संतोष (68) शामिल हैं। अधिकांश मरीजों के परिजनों अथवा स्थायी पते की जानकारी अस्पताल के पास उपलब्ध नहीं है।

इलाज मिला, अब आश्रय की चिंता

इन मरीजों को अस्पताल में चिकित्सा सुविधा मिल रही है, लेकिन उपचार के बाद इनके रहने की व्यवस्था को लेकर अस्पताल प्रबंधन के सामने समस्या खड़ी है। पहचान और परिजनों का पता नहीं होने के कारण इन्हें उनके घर तक पहुंचाना भी संभव नहीं है। यही वजह है कि अस्पताल को मोक्ष आश्रय की ओर मदद के लिए देखना पड़ा।

सीमित संसाधनों में बेसहारों का सहारा

मोक्ष मानव सेवा एवं जन उत्थान समिति पिछले करीब तीन दशक से लावारिस और निराश्रित लोगों को आश्रय, भोजन, उपचार, सेवा और देखभाल उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है। मृत्यु होने की स्थिति में संस्था द्वारा सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार भी किया जाता है। अस्पतालों से ऐसे मरीजों को पूर्व में भी मोक्ष आश्रय भेजा जाता रहा है।

हालांकि संस्था स्वयं सीमित संसाधनों में इन बेसहारा लोगों की सेवा कर रही है। आश्रय में जगह और संसाधनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। संस्था की ओर से नगर निगम से भी मदद की अपेक्षा की गई है, लेकिन पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने से व्यवस्थाएं चुनौतीपूर्ण बनी हुई हैं। ऐसे में अस्पतालों द्वारा लगातार निराश्रित मरीजों को मोक्ष आश्रय भेजे जाने से संस्था पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है।

व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

सवाल यह है कि जब परिवार ऐसे मरीजों को छोड़ चुके हैं और उनकी पहचान तक उपलब्ध नहीं है, तो इलाज के बाद उनकी जिम्मेदारी किसकी है? अस्पताल उपचार कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देता है, लेकिन उसके बाद इन मरीजों के लिए सुरक्षित छत, भोजन और निरंतर देखभाल की व्यवस्था कौन करेगा? क्या जिला स्तर पर ऐसे मरीजों के लिए स्थायी आश्रय गृह और चिकित्सकीय देखभाल की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?मोक्ष आश्रय अपने सीमित संसाधनों में अंतिम छोर पर खड़े लोगों को सहारा दे रहा है। ऐसे में शासन-प्रशासन और नगर निगम को संस्था की क्षमताओं को देखते हुए कम से कम आवश्यक संसाधन और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराने की जरूरत है, ताकि अस्पतालों से निकलने के बाद कोई निराश्रित मरीज फिर सड़क पर जीवन बिताने को मजबूर न हो।