काम के लिए कार्यकर्ता और दाम के लिए सिद्धांत, भाजपा कार्यकर्ताओं में बढ़ रही बेचैनी


जबलपुर। भारतीय जनता पार्टी का संगठन लगातार सक्रिय है। अभियान पर अभियान, बैठकों का दौर, मंडल स्तर पर जिम्मेदारियों का बंटवारा और कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी—सब कुछ चलता दिखाई दे रहा है। लेकिन इसी सक्रियता के बीच पार्टी के भीतर एक दूसरा सवाल भी धीरे-धीरे तेज हो रहा है—क्या भाजपा का आम कार्यकर्ता सिर्फ कार्यक्रमों की भीड़ जुटाने और संगठन का लक्ष्य पूरा करने के लिए रह गया है? जबलपुर भाजपा में कार्यकर्ताओं के एक वर्ग के बीच असंतोष की चर्चा इन दिनों तेज है। वर्षों से पार्टी के लिए समय देने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन जब भी आवाज लगाता है, वे घर-परिवार और निजी काम छोड़कर मैदान में उतर जाते हैं। बैठक हो, अभियान हो या बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम—कार्यकर्ता अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। लेकिन जब उसी कार्यकर्ता को अपने जायज काम के लिए नेतृत्व की जरूरत पड़ती है तो उसे कथित तौर पर लंबा इंतजार करना पड़ता है। भाजपा कार्यकर्ता की पीड़ा यह है कि काम तो भरपूर लिया जाता हैं लेकिन दाम के रुप में सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं| दरअसल यहां दाम से आशय यहां मेहनताना या मानदेय नहीं बल्कि वह छोटे मोटे काम है जिनकी अपेक्षा कार्यकर्ताओं के आसपास रहने वाले या उनके नजदीकी रिश्तेदार रखते है| सिफारिश के लिए बड़े नेताओं के पास जाने के लिए उन्हें निराशा हाथ लगती है| यही वजह है कि कार्यकर्ताओं के अंदर बेचैनी बढ़ रही है|

परेशानी में नहीं होती सुनवाई’………

कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सबसे बड़ा केंद्र यही सवाल बनता जा रहा है। कई कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा है कि वे अपने रिश्तेदारों के स्थानांतरण, स्थानांतरण रुकवाने या दूसरे जायज प्रशासनिक मामलों को लेकर लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों और समस्याओं पर अपेक्षित सुनवाई नहीं हो रही।
एक कार्यकर्ता की व्यथा कुछ ऐसी है—“पार्टी के कार्यक्रम में समय चाहिए तो हम सबसे पहले खड़े हैं, लेकिन हमारे काम की बात आती है तो हम किसके पास जाएं?” यही सवाल अब संगठन के भीतर असंतोष का आधार बन रहा है।

चापलूसों का वजन, संघर्ष की उपेक्षा……….

पार्टी के अंदर चर्चा का दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा गंभीर है। कुछ कार्यकर्ताओं को महसूस हो रहा है कि लंबे समय से संगठन के लिए काम करने वालों की तुलना में नए चेहरों को राजनीतिक पहचान और प्रभाव तेजी से मिल रहा है। कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा भी सुनाई दे रही है कि बड़े नेताओं के आसपास रहने और राजनीतिक संपर्क मजबूत करने वाले कुछ लोग तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। इसके उलट बूथ और मंडल स्तर पर वर्षों से मेहनत करने वाला सामान्य कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। यह धारणा सही है या गलत, यह संगठन को तय करना है। लेकिन यदि ऐसी भावना लगातार कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बन रही है तो इसे नजरअंदाज करना भी संगठन के लिए आसान नहीं होगा।

पद की उम्मीदों का सिर्फ इंतजार………..

कार्यकर्ताओं की बेचैनी केवल व्यक्तिगत कामों तक सीमित नहीं है। संगठनात्मक और राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी लंबे समय से उम्मीदें बनी हुई हैं। कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि कई स्तरों पर नियुक्तियां अभी बाकी हैं। युवा मोर्चा में भी संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर इंतजार है। खाली पड़े निगम-मंडलों में नियुक्तियों का सवाल भी कार्यकर्ताओं की निगाह में है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यदि पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता लगातार अभियान चला रहा है, बैठकें कर रहा है और संगठन के लिए समय दे रहा है, तो उसे राजनीतिक भागीदारी और जिम्मेदारी का अवसर कब मिलेगा?

स्थानीय राजनीतिक स्तर पर नगर सरकार से जुड़े समीकरणों को लेकर भी कार्यकर्ताओं की नजरें टिकी हैं। सत्ता और संगठन के बीच तालमेल में जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका और उन्हें मिलने वाले अवसर को लेकर चर्चाएं लगातार जारी हैं। कार्यकर्ता यह देखना चाहते हैं कि जब राजनीतिक हिस्सेदारी और जिम्मेदारी बांटने का समय आएगा तो क्या वर्षों से पार्टी का झंडा उठाने वाले चेहरे आगे आएंगे या फिर प्रभावशाली संपर्क रखने वालों का दबदबा कायम रहेगा?

नाराजगी बढ़ा रही जोखिम…………

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ आधारित संगठन और समर्पित कार्यकर्ता माना जाता है। यही वजह है कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी को महज व्यक्तिगत शिकायत मानकर टाल देना संगठन के लिए जोखिम भरा हो सकता है। क्योंकि नाराज कार्यकर्ता हमेशा पार्टी छोड़कर नहीं जाता—कई बार वह सिर्फ खामोश हो जाता है। और चुनावी राजनीति में यही खामोशी सबसे महंगी पड़ सकती है। जबलपुर भाजपा के सामने चुनौती अब केवल नए अभियान चलाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि हर अभियान के पीछे खड़े कार्यकर्ता को यह भरोसा दिलाया जाए कि संगठन को उसकी भी उतनी ही जरूरत है, जितनी उसके समय और मेहनत की।
फिलहाल जबलपुर भाजपा के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है— “बैठक में बुलाने और जिम्मेदारी देने से कार्यकर्ता अपना हो जाता है, लेकिन क्या उसकी परेशानी सुनने से भी संगठन अपना बनता है?” इस सवाल का जवाब अब भाजपा के स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों में तलाशा जा रहा है।