*[शामी एम इरफ़ान, मुम्बई]
मुंबई दूरदर्शन के कैमरामैन से निर्माता-निर्देशक और FTII के चेयरमैन तक का सफर; अपराध, रहस्य और हास्य की दुनिया में छोड़ी अमिट छाप
भारतीय टेलीविजन के इतिहास में बृजेंद्र पाल सिंह यानी बी.पी. सिंह का नाम उन रचनाकारों में लिया जाएगा, जिन्होंने छोटे पर्दे पर अपराध और रहस्य की कहानियों को लोकप्रियता की नई पहचान दी। ‘सीआईडी’ और ‘आहट’ जैसे धारावाहिकों से दर्शकों की कई पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले सिंह ने केवल एक सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में ही नहीं, बल्कि कैमरामैन, अभिनेता और फिल्म शिक्षा के प्रशासक के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी रचनात्मक यात्रा का दायरा अपराध कथाओं से लेकर मूक हास्य तक फैला था।
27 अक्टूबर 2026 को 77 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय टेलीविजन ने एक ऐसे रचनाकार को खो दिया, जिसकी पहचान उसके बनाए कार्यक्रमों और उनके यादगार पात्रों से जुड़ी रही। देहरादून से शुरू हुआ उनका सफर मुंबई की मायानगरी तक पहुंचा और फिर देश के प्रतिष्ठित फिल्म शिक्षण संस्थान के नेतृत्व तक विस्तृत हुआ।
दूरदर्शन से मनोरंजन जगत तक
बी.पी. सिंह ने 1970 से 1973 के बीच पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में सिनेमैटोग्राफी की शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद 1973 में उन्होंने दूरदर्शन में समाचार कैमरामैन के रूप में काम शुरू किया। लगभग एक दशक तक कैमरे के साथ काम करते हुए उन्होंने दृश्य संयोजन, प्रकाश, फ्रेम और दृश्य माध्यम की तकनीकी बारीकियों का अनुभव हासिल किया।
इसके बाद वे कार्यक्रम निर्माण और निर्देशन की ओर बढ़े। दूरदर्शन के लिए उनकी शुरुआती परियोजनाओं में टेलीफिल्म ‘सिर्फ चार दिन’ और धारावाहिक ‘एक शून्य शून्य’ का उल्लेख किया जाता है। ‘एक शून्य शून्य’ ने अपराध और जासूसी की कहानियों के प्रति उनकी रुचि को सामने रखा। आगे चलकर यही रुचि उनके करियर की सबसे बड़ी पहचान बनी।
‘आहट’ ने जगाया रहस्य और रोमांच का आकर्षण
वर्ष 1995 में सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर प्रसारित होना शुरू हुआ धारावाहिक ‘आहट’ बी.पी. सिंह की महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों में शामिल रहा। शुरुआत में रहस्य और रोमांच पर केंद्रित इस कार्यक्रम ने आगे चलकर अलौकिक घटनाओं तथा डरावनी कहानियों को भी अपना हिस्सा बनाया। इसके वातावरण, ध्वनि प्रभावों और अप्रत्याशित घटनाक्रम ने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई।
‘आहट’ लगभग दो दशकों तक विभिन्न चरणों में प्रसारित होता रहा और 2015 तक इसका सफर जारी रहा। भारतीय टेलीविजन पर हॉरर विधा को लोकप्रिय बनाने में इस कार्यक्रम का उल्लेखनीय योगदान रहा। सीमित दृश्य संसाधनों के बावजूद दर्शकों के मन में भय और जिज्ञासा पैदा करना इसकी प्रस्तुति की विशेषता थी।
‘सीआईडी’ ने बनाया लोकप्रियता का नया रिकॉर्ड
बी.पी. सिंह के करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1998 में आया, जब ‘सीआईडी’ का प्रसारण शुरू हुआ। अपराध की जांच करने वाली एक टीम पर आधारित इस धारावाहिक ने भारतीय टेलीविजन पर अपनी अलग जगह बनाई। मामलों की गुत्थियां सुलझाने, सबूतों की पड़ताल करने और अपराधी तक पहुंचने की प्रक्रिया को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत करना इसकी प्रमुख विशेषता रही।
शिवाजी साटम ने एसीपी प्रद्युमन, आदित्य श्रीवास्तव ने इंस्पेक्टर अभिजीत और दयानंद शेट्टी ने इंस्पेक्टर दया के रूप में दर्शकों का दिल जीता। इन पात्रों के बीच का तालमेल, संवाद और विशिष्ट अंदाज कार्यक्रम की लोकप्रियता का आधार बने। ‘सीआईडी’ ने दो दशकों से अधिक समय तक दर्शकों से अपना संबंध बनाए रखा। इसका मूल प्रसारण 2018 तक चला और बाद में धारावाहिक ने नए दौर में भी वापसी की।
इसकी लोकप्रियता केवल टेलीविजन तक सीमित नहीं रही। कार्यक्रम के संवाद और दृश्य इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा बने और सोशल मीडिया पर मीम्स के रूप में भी खूब इस्तेमाल किए गए। यह किसी भी धारावाहिक के लिए बड़ी उपलब्धि है कि उसके पात्र प्रसारण के वर्षों बाद भी लोगों की बातचीत में मौजूद रहें।
111 मिनट का एक शॉट और रिकॉर्ड में दर्ज उपलब्धि
‘सीआईडी’ की छहवीं वर्षगांठ के अवसर पर अक्टूबर 2004 में बी.पी. सिंह ने 111 मिनट का विशेष एपिसोड एक ही लगातार शॉट में फिल्माया। ‘द इनहेरिटेंस’ नाम के इस एपिसोड में बिना सामान्य कट लगाए कैमरे और कलाकारों के बीच लगातार तालमेल बनाए रखना बड़ी तकनीकी चुनौती थी।
इस उपलब्धि को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिला। इसे टेलीविजन पर लगातार फिल्माए गए लंबे शॉट के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया। यह प्रयोग बी.पी. सिंह की तकनीकी दक्षता, कैमरे पर पकड़ और निर्देशन संबंधी तैयारी का प्रमाण था। एक कैमरामैन के रूप में शुरू हुआ उनका सफर इस उपलब्धि में अपने विशिष्ट रूप में दिखाई दिया।
गंभीर अपराध कथाओं के बीच ‘गुटुर गूं’ का हास्य
बी.पी. सिंह की बहुमुखी प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सब टीवी का मूक हास्य कार्यक्रम ‘गुटुर गूं’ है, जिसका प्रसारण 2010 में शुरू हुआ और 2014 तक चला। भारत के शुरुआती संवादरहित हास्य कार्यक्रमों में शामिल इस प्रस्तुति में कलाकारों के चेहरे के भाव, शारीरिक गतिविधियों और बैकग्राउंड संगीत के माध्यम से कहानी कही जाती थी।
सुनील ग्रोवर, कुणाल कुमार और भावना बलसावर जैसे कलाकारों से जुड़ी इस प्रस्तुति ने बिना संवादों के हास्य पैदा करने की चुनौती को अपनाया। इसमें कलाकारों की टाइमिंग, शारीरिक अभिव्यक्ति और दृश्य संयोजन की विशेष भूमिका थी। कार्यक्रम ने तीन सीजन तक दर्शकों का मनोरंजन किया।
‘गुटुर गूं’ इस बात का उदाहरण था कि बी.पी. सिंह केवल गंभीर अपराध कथाओं तक सीमित नहीं थे। वे अलग-अलग विधाओं में प्रयोग करने का साहस रखते थे। उनके अन्य कार्यक्रमों में ‘हम ने ली है… शपथ’, ‘सुपरकॉप्स वर्सेस सुपरविलेन्स’ और वेब सीरीज ‘अभय’ का भी उल्लेख किया जाता है। इन परियोजनाओं के जरिए उनका काम पारंपरिक टेलीविजन से लेकर नए डिजिटल मनोरंजन माध्यमों तक पहुंचा।
कैमरे के सामने भी छाए डीसीपी चित्रोले
निर्माता-निर्देशक के रूप में पहचान बना चुके बी.पी. सिंह ने ‘सीआईडी’ में डीसीपी शमशेर सिंह चित्रोले का किरदार निभाकर अभिनय में भी अपनी छाप छोड़ी। उनका सख्त मिजाज, अनोखा हास्य और एसीपी प्रद्युमन के साथ खट्टी-मीठी नोकझोंक दर्शकों को खूब पसंद आई।
चित्रोले का किरदार गंभीर जांच के बीच हास्य का रंग भरता था। उनके संवाद और हाव-भाव सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय हुए। यह दिलचस्प विरोधाभास था कि कैमरे के पीछे रहकर दूसरों के लिए पात्र रचने वाले सिंह स्वयं भी अपने बनाए कार्यक्रम में एक यादगार पात्र बन गए।
IFTDA से FTII तक संस्थागत जिम्मेदारी
बी.पी. सिंह का योगदान केवल मनोरंजन कार्यक्रमों के निर्माण तक सीमित नहीं रहा। वे इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसिएशन (IFTDA) के अध्यक्ष भी रहे। इस भूमिका में उनका संबंध निर्देशकों के पेशेवर हितों और फिल्म-टेलीविजन उद्योग के मुद्दों से रहा। उनके सहयोगियों ने संस्था में उनके नेतृत्व और व्यक्तिगत संबंधों को भी याद किया।
दिसंबर 2018 में उन्हें FTII सोसाइटी का अध्यक्ष और संस्थान की गवर्निंग काउंसिल का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उन्होंने अनुपम खेर के बाद यह जिम्मेदारी संभाली और सितंबर 2020 तक इस पद पर रहे। जिस संस्थान से उन्होंने सिनेमैटोग्राफी की शिक्षा प्राप्त की थी, उसी के प्रशासनिक नेतृत्व तक पहुंचना उनके करियर का उल्लेखनीय पड़ाव था।
FTII में उन्होंने संस्थान के बुनियादी ढांचे में सुधार, अधूरे स्टूडियो कार्यों को गति देने, शिक्षकों के कौशल विकास और पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाने पर जोर दिया। पाठ्यक्रम को क्रेडिट-आधारित व्यवस्था के अनुरूप बनाने के लिए विशेष अकादमिक समिति गठित करने तथा संस्थान से पढ़ाई पूरी कर चुके विद्यार्थियों की लघु फिल्मों को आर्थिक सहायता देने के लिए कॉर्पस फंड की वकालत करने जैसी पहलों का भी उल्लेख किया जाता है।
इससे पहले 2014 से 2017 के बीच वे FTII की अकादमिक परिषद के अध्यक्ष रहे थे। मई 2017 में संस्थान की फिल्म शिक्षा को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने वाली पहल ‘स्किफ्ट’ (SKIFT) के विकास से भी उनका जुड़ाव रहा। इस कार्यक्रम के तहत अनेक शहरों और कस्बों में लघु अवधि के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किए गए। इस प्रकार, उनका अनुभव केवल फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि फिल्म शिक्षा और प्रशिक्षण के विस्तार से भी जुड़ा था।
निजी जीवन और परिवार का साथ
बी.पी. सिंह का निजी जीवन अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक रहा। उनकी पत्नी रेणु बृजेंद्र सिंह उनके प्रोडक्शन हाउस ‘फायरवर्क्स प्रोडक्शंस’ में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में काम संभालती थीं। उनके छोटे बेटे अक्षय सिंह भी मीडिया और प्रोडक्शन से जुड़े रहे। परिवार उनके व्यावसायिक जीवन का महत्वपूर्ण सहयोगी रहा।
उनके जीवन का सबसे दुखद अध्याय बड़े बेटे सलिल सिंह का असामयिक निधन था। सलिल स्वयं निर्देशक और लेखक थे तथा ‘सीआईडी’ और ‘सावधान इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों के कई एपिसोड का निर्देशन कर चुके थे। अक्टूबर 2017 में एक शूटिंग सेट पर दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र लगभग 30 से 35 वर्ष के बीच बताई गई थी। इस घटना से परिवार को गहरा आघात पहुंचा। सलिल की पत्नी माधवी सिंह भी परिवार का हिस्सा हैं।
बी.पी. सिंह के काम के प्रति समर्पण का उल्लेख करते हुए ‘सीआईडी’ में दया की भूमिका निभाने वाले दयानंद शेट्टी ने कहा कि सिंह की जिंदगी में कंटेंट बनाने के अलावा कोई दूसरी जिंदगी नहीं थी और वे अपने काम के प्रति बेहद जुनूनी थे। यह टिप्पणी उनके लंबे रचनात्मक सफर और काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।
विरासत, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी
बी.पी. सिंह का निधन भारतीय मनोरंजन जगत के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है। दूरदर्शन के समाचार कैमरामैन से शुरुआत कर ‘आहट’ और ‘सीआईडी’ जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों का निर्माण, ‘गुटुर गूं’ के जरिए हास्य विधा में प्रयोग, डीसीपी चित्रोले के रूप में अभिनय और FTII के चेयरमैन तक की यात्रा उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को सामने लाती है।
उनकी उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल लोकप्रियता या रिकॉर्ड के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। उनका योगदान इस बात में भी है कि उन्होंने तकनीकी दक्षता को कहानी कहने की कला से जोड़ा, लंबे समय तक दर्शकों की रुचि बनाए रखी और अलग-अलग विधाओं में प्रयोग किए। उनके कार्यक्रमों ने अनेक कलाकारों और तकनीकी कर्मियों को काम करने का अवसर दिया तथा दर्शकों के बीच टेलीविजन मनोरंजन की एक स्थायी पहचान बनाई।
बी.पी. सिंह की विरासत उनके बनाए पात्रों, धारावाहिकों और तकनीकी प्रयोगों में जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियों के फिल्मकारों के लिए उनका सफर इस बात की मिसाल रहेगा कि कैमरे की तकनीकी समझ, विषय के प्रति लगाव, रचनात्मक साहस और निरंतर मेहनत के सहारे एक व्यक्ति भारतीय टेलीविजन के इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान बना सकता है।
~ शामी एम इरफ़ान