जबलपुर। त्योहारों पर सुरक्षा के इंतजामों को लेकर हर साल निर्देश जारी होते हैं, बैठकें होती हैं और हादसों से सबक लेकर सावधानी बरतने के दावे किए जाते हैं। लेकिन इन दावों की हकीकत मझौली में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान हुए दर्दनाक हादसे ने उजागर कर दी। देर रात करीब एक बजे बिजली के तारों की चपेट में आने से तीन युवकों की जान चली गई, जबकि दस से अधिक लोग झुलस गए। जिस उत्सव में मां दुर्गा को विदाई देने के लिए लोग एकत्र हुए थे, वहां कुछ ही पलों में चीख-पुकार और अफरातफरी का माहौल बन गया। इस हादसे ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सुरक्षा संबंधी चेतावनियों और व्यवस्थागत खामियों के बावजूद लोगों की जान जोखिम में क्यों पड़ रही है?
तारों की चपेट में आया विसर्जन जुलूस……..
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सिविल लाइन पाठ की दुर्गा प्रतिमा ट्रैक्टर-ट्रॉली में रखकर नरीली तालाब में विसर्जन के लिए ले जाई जा रही थी। प्रतिमा के साथ 50 से अधिक लोग चल रहे थे। जुलूस जब सिविल लाइन के पास पहुंचा, तब रास्ते में झूल रहे बिजली के तार को ऊपर उठाने का प्रयास किया गया। इसी दौरान तार के हाईटेंशन लाइन के संपर्क में आने से करंट फैल गया। इसके बाद तार टूटकर ट्रैक्टर-ट्रॉली पर गिर गया और उसकी चपेट में आए लोग बुरी तरह झुलस गए। हादसे में ट्रैक्टर पर सवार 22 वर्षीय विकास राजपूत और 23 वर्षीय प्रिंस चौहान की मौके पर ही मौत हो गई। तीसरे युवक ने सुबह अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। वहीं, मयंक राजपूत, विक्की रैकवार, मनीष राजपूत और आयुष रैकवार सहित कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए। घायलों को पहले मझौली स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां से गंभीर हालत को देखते हुए मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।
चेतावनी के बाद भी क्यों नहीं सुधरी व्यवस्था?………..
इस हादसे का सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्थानीय लोगों के मुताबिक, बिजली के तार नीचे झूलने की समस्या पहले भी अधिकारियों के सामने उठाई गई थी। बताया गया कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों और आयोजन समिति के सदस्यों की बैठक में इस खतरे की ओर ध्यान दिलाया गया था और तारों को दुरुस्त कराने की बात भी कही गई थी। इसके बावजूद यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो यह महज तकनीकी चूक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने में हुई गंभीर विफलता का मामला है।सवाल यह है कि जब विसर्जन मार्ग पर बिजली के तारों से खतरे की आशंका पहले से थी, तो समय रहते निरीक्षण क्यों नहीं कराया गया? बिजली विभाग ने तारों को सुरक्षित ऊंचाई पर रखने के लिए क्या कदम उठाए? आयोजन समिति और प्रशासन ने जुलूस रवाना होने से पहले मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित की थी या नहीं? इन सवालों के जवाब जांच के जरिए सामने आने चाहिए।
हादसे के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल…………
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि हादसे के बाद घायलों को मझौली स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, लेकिन वहां तत्काल उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। लोगों के अनुसार, डॉक्टर करीब आधे घंटे बाद पहुंचे। उनका दावा है कि तब तक दो युवकों की मौत हो चुकी थी। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन यदि आपात स्थिति में समय पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध नहीं थी, तो यह भी जांच का विषय है। बिजली के करंट से झुलसे मरीजों के मामले में शुरुआती उपचार और त्वरित रेफरल बेहद अहम होते हैं।
पिछले हादसों से सबक आखिर कहां गया?…………
पिछले वर्षों में धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और विसर्जन के दौरान हुए हादसों के बाद सुरक्षा को लेकर सावधानियां बढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है। बिजली के तारों की जांच, संवेदनशील मार्गों का निरीक्षण, आपात चिकित्सा व्यवस्था और संबंधित विभागों के बीच समन्वय जैसे उपायों की जरूरत बार-बार सामने आती है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह की घटना होना व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।त्योहारों के दौरान भीड़ और उत्साह के बीच जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे में प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी केवल निर्देश जारी करने तक सीमित नहीं रह सकती। जमीनी स्तर पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि विसर्जन मार्ग सुरक्षित हों, बिजली की लाइनें खतरे से मुक्त हों और आपात स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध रहे।मझौली की घटना में तीन परिवारों ने अपने युवा सदस्यों को खो दिया और कई परिवारों के लोग अस्पताल में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब जरूरत केवल हादसे पर दुख जताने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की है। बिजली के तारों की स्थिति, पूर्व में दी गई शिकायतों, विभागीय कार्रवाई और स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध व्यवस्थाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।