जबलपुर श्री रामलीला समिति गढ़ा जबालीपुरम के सिद्ध मंच पर रामलीला के 11वें दिन लंका दहन और विभीषण की भगवान श्रीराम के प्रति शरणागति की भावपूर्ण एवं रोमांचक लीला का मंचन किया गया। भक्ति, वीरता, अहंकार और धर्म की विजय के इस प्रसंग ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।लीला का शुभारंभ भगवान श्रीराम की आरती के साथ हुआ। आरती में संचालक पंडित अशोक मनोध्याय, समिति अध्यक्ष एवं निर्देशक राजेश मिश्रा, महामंत्री एडवोकेट अरुण दीक्षित, डॉ. पंकज सुलेखा क्षत्री, श्रीमती सुधा गौतम एवं डॉ. श्रीमती भाटिया सहित मानस सत्संग परिवार, पाटन से पहुंचे श्रद्धालु ठाकुर रणधीर सिंह, सुरेंद्र सिंह ठाकुर, घनश्याम प्रसाद बबेले, राघवेंद्र शुक्ला, शिवकुमार वाजपेयी, रामसेवक अग्रवाल, गौरीशंकर तिवारी एवं मोहन तिवारी ने प्रभु श्रीराम के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।इसके बाद पवनपुत्र हनुमान माता सीता की खोज में लंका पहुंचे। अशोक वाटिका में माता सीता से भेंट कर उन्होंने भगवान श्रीराम का संदेश दिया और शीघ्र ही उन्हें रावण के बंधन से मुक्त कराने का भरोसा दिलाया। इसके बाद हनुमान ने वाटिका में फल खाए और राक्षसों को चुनौती देते हुए रावण की सभा में पहुंचे। उन्होंने रावण को समझाया कि वह अहंकार त्यागकर माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम को लौटा दे, लेकिन अहंकार में डूबे रावण ने उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश दे दिया।
**हनुमान के पराक्रम से धू-धू कर जली सोने की लंका**
पूंछ में आग लगते ही बजरंगबली ने विकराल रूप धारण कर लिया और देखते ही देखते सोने की लंका को आग के हवाले कर दिया। चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगीं। इस रोमांचक दृश्य के दौरान दर्शकों ने जय श्रीराम और जय हनुमान के जयकारों से वातावरण गुंजायमान कर दिया।
*उलटि-पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥*
लंका दहन के बाद लीला में नया मोड़ आया। रावण और विभीषण के बीच तीखा संवाद हुआ। रावण द्वारा अपमानित किए जाने पर विभीषण ने अधर्म का साथ छोड़ने का निर्णय लिया और लंका त्यागकर भगवान श्रीराम की शरण में पहुंच गए।
विभीषण ने हाथ जोड़कर अपनी विनय प्रस्तुत की—
*नाथ दसानन कर मैं भ्राता।
निसिचर बंस जनम सुर त्राता॥*
इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीराम से प्रार्थना की—
*श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु, भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन, शरण सुखद रघुबीर॥*
**श्रीराम ने विभीषण को गले लगाकर दिया सम्मान**
शरणागत वत्सल भगवान श्रीराम ने विभीषण को गले लगाकर अपनाया और उन्हें लंका का भावी राजा घोषित किया। इस प्रसंग के माध्यम से संदेश दिया गया कि व्यक्ति का मूल्य उसके कुल या जन्म से नहीं, बल्कि उसके विचारों, आचरण और कर्मों से निर्धारित होता है। इसके बाद भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई की तैयारी शुरू की, जिससे आगामी युद्ध की भूमिका तैयार हुई।
**यज्ञाचार्य पंडित संतोष शास्त्री का सम्मान**
रामलीला दर्शन के लिए पहुंचे यज्ञाचार्य पंडित संतोष शास्त्री मजीठा वालों का समिति की ओर से सम्मान किया गया। इस अवसर पर संचालक पंडित अशोक मनोध्याय ने बताया कि पंडित संतोष शास्त्री पूर्व में रामलीला मैदान में दो यज्ञ संपन्न करा चुके हैं। उन्होंने बताया कि मार्च 2027 में 60वें वर्ष की षष्ठिपूर्ति के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले श्रीराम-जानकी यज्ञ के प्रधान यज्ञाचार्य भी पंडित संतोष शास्त्री होंगे।इस अवसर पर समिति के सभी स्थायी आजीवन सदस्य एवं कार्यकारिणी सदस्य उपस्थित रहे।
समिति ने जानकारी दी कि रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को सेतुबंध रामेश्वर पूजन एवं अंगद-रावण संवाद की लीला का मंचन किया जाएगा।