श्रीमद्भागवत कथा में रुक्मिणी विवाह एवं महारास का हुआ भावपूर्ण वर्णन

जबलपुर। गीताधाम में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के षष्ठम दिवस कथा व्यास श्रीमद् जगतगुरु नृसिंह पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं के साथ रुक्मिणी विवाह एवं महारास का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन लीला, गोपी प्रेम, रासलीला एवं महारास का सुंदर वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला जीवात्मा और परमात्मा के दिव्य प्रेम एवं समर्पण का प्रतीक है। गोपियों की भक्ति हमें निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण की प्रेरणा देती है।

कथा के दौरान रुक्मिणी विवाह का प्रसंग भी अत्यंत भावपूर्ण ढंग से सुनाया गया। महाराज श्री ने बताया कि माता रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानती थीं और मन ही मन उन्हें पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं। जब रुक्मिणी जी के विवाह की तैयारी किसी अन्य से की जाने लगी, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर अपनी रक्षा एवं स्वीकार करने की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी का हरण कर उनसे विधिपूर्वक विवाह किया।रुक्मिणी विवाह के प्रसंग पर कथा स्थल में “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” के जयकारे गूंज उठे। श्रद्धालुओं ने विवाह उत्सव में भक्तिभाव से भाग लिया और पूरा गीताधाम मंगलमय वातावरण में सराबोर हो गया।
महाराज श्री ने कहा कि रुक्मिणी विवाह हमें भगवान के प्रति अटूट विश्वास, श्रद्धा और समर्पण का संदेश देता है। जो भक्त सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, भगवान सदैव उसकी रक्षा करते हैं।षष्ठम दिवस की कथा में रासलीला, गोपी प्रेम एवं रुक्मिणी विवाह के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। भजन, संकीर्तन और जयकारों से पूरा गीताधाम भक्तिमय बना रहा।