जबलपुर। देश के राष्ट्रीय ध्वज और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, कवि और अमर झंडा गीत “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा” के रचयिता थे। राष्ट्र के प्रति उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1973 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया।
प्रारंभिक जीवन
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जन्म 16 सितंबर 1893 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नरवल कस्बे में हुआ था। कुछ स्रोतों में उनकी जन्मतिथि 9 सितंबर 1896 भी बताई गई है। उनके पिता का नाम विश्वेश्वर प्रसाद गुप्त और माता का नाम कौशल्या देवी था। वे पांच भाइयों में सबसे छोटे थे।
उन्होंने मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद विशारद की उपाधि प्राप्त की। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने अध्यापन के साथ व्यापार भी किया, लेकिन देश की स्वतंत्रता और समाज सुधार के प्रति उनका समर्पण उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर ले गया।
स्वतंत्रता संग्राम में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। वर्ष 1921 में उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक देश स्वतंत्र नहीं होगा, वे नंगे पैर रहेंगे तथा जूते-चप्पल और छाते का उपयोग नहीं करेंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उन्होंने लंबे समय तक अपने इस संकल्प का पालन किया।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल भी गए। उनका जीवन राष्ट्रसेवा और त्याग की मिसाल रहा।
ऐसे बना अमर झंडा गीत
वर्ष 1924 में कानपुर में श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने देशभक्ति से ओतप्रोत ऐतिहासिक गीत “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा” की रचना की। यह गीत देखते ही देखते स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का प्रतीक बन गया।
वर्ष 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस गीत को आधिकारिक रूप से ‘झंडा गीत’ के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद यह गीत राष्ट्रीय आंदोलनों और सार्वजनिक आयोजनों में देशभक्ति की भावना जगाने वाला प्रमुख गीत बन गया।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा था कि भले ही लोग पार्षद जी को व्यक्तिगत रूप से न जानते हों, लेकिन पूरा देश राष्ट्रीय ध्वज पर लिखे उनके गीत से परिचित है।
साहित्य और समाज सुधार के क्षेत्र में योगदान
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ केवल राष्ट्रकवि ही नहीं, बल्कि साहित्य और समाज सुधार के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वे ‘वैश्य पत्रिका’ के आजीवन संपादक रहे। रामचरितमानस के प्रति उनकी गहरी आस्था थी और वे एक प्रख्यात ‘मानस मर्मज्ञ’ के रूप में भी जाने जाते थे।
उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और विधवा विवाह जैसी सामाजिक सुधार की पहल का समर्थन किया। उनका साहित्य और सार्वजनिक जीवन राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों से प्रेरित रहा।
पद्मश्री से सम्मानित
राष्ट्र और समाज के प्रति उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1973 में श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ को पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके राष्ट्रसेवा और साहित्यिक योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान थी।
10 अगस्त 1977 को हुआ निधन
मां भारती के इस महान सपूत का 10 अगस्त 1977 को निधन हो गया। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द आज भी करोड़ों भारतीयों के भीतर राष्ट्रप्रेम और तिरंगे के प्रति सम्मान की भावना जगाते हैं।
उनकी स्मृति को स्थायी बनाने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1997 में उनके सम्मान में विशेष डाक टिकट भी जारी किया।श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कलम और विचार भी स्वतंत्रता संग्राम के सशक्त हथियार बन सकते हैं। उनका अमर झंडा गीत आज भी तिरंगे की शान और राष्ट्रभक्ति की भावना को स्वर देता है।