फूल से रंग और अगरबत्ती बनाने मंदिरों से नहीं उठाए जा रहे फूल

जबलपु रशहर में मंदिरों से निकलने वाले फूलों को एकत्र कर उनसेप्राकृतिक रंग और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की नगर निगम की कवायद जमीनी हकीकत में सवालों के घेरे में है। एक तरफ निगम फूलों को कचरे से अलग कर उनका सदुपयोग करने और प्राकृतिक रंग तैयार करने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर शहर के प्रमुख मंदिरों से फूलों का नियमित उठाव तक नहीं हो पा रहा है। गलगला चौक स्थित शिव मंदिर इसका जीता-जागता उदाहरण बना हुआ है।मंदिर परिसर में कई दिनों से पूजा के बाद बचने वाले फूल पड़े हुए हैं। लंबे समय से उठाव नहीं होने के कारण फूल सड़ने लगे हैं और उनसे दुर्गंध उठ रही है। मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को इसी सड़ते फूलों के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा है। स्थिति देखकर सहज ही सवाल उठता है कि जब मंदिरों से निकलने वाले फूलों का नियमित संग्रहण ही नहीं हो रहा, तो उनसे प्राकृतिक रंग बनाने की योजना आखिर कितनी जमीन पर उतर रही है?

कागजों पर दो पाली, जमीन पर सड़ता कचरा

नगर निगम की ओर से शहर में दो पाली में कचरा उठाने की व्यवस्था के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद गलगला चौक जैसे व्यस्त और सार्वजनिक स्थल पर मंदिर का जैविक कचरा कई दिनों तक पड़ा रहना व्यवस्था की पोल खोलता नजर आ रहा है। यदि सामान्य कचरा उठाने वाली व्यवस्था इतनी कमजोर है तो मंदिरों से फूल अलग-अलग एकत्र कर उन्हें प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

फूलों से रंग बनाने की योजना का क्या हुआ?

मंदिरों में रोजाना बड़ी मात्रा में फूल चढ़ाए जाते हैं। इन्हें सामान्य कचरे में फेंकने के बजाय अलग से एकत्र कर प्राकृतिक रंग, अगरबत्ती, खाद और अन्य उत्पाद तैयार करने की योजनाएं पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से उपयोगी मानी जाती हैं। लेकिन ऐसी योजनाओं की सफलता तभी संभव है, जब फूलों का समय पर संग्रहण, पृथक्करण और परिवहन सुनिश्चित हो।

गलगला चौक के शिव मंदिर की स्थिति इन दावों पर ही सवाल खड़े कर रही है। यहां फूल कई दिनों तक पड़े रहें और सड़ने के बाद दुर्गंध फैलाने लगें, तो प्राकृतिक रंग बनाने की पूरी कवायद केवल फाइलों और कागजों तक सीमित नजर आती है।

श्रद्धा के फूल बने दुर्गंध का कारण

मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पूजा के बाद छोड़े गए फूल श्रद्धा का हिस्सा हैं, लेकिन समय पर उठाव न होने पर यही फूल सड़कर गंदगी और दुर्गंध का कारण बन जाते हैं। इससे न केवल मंदिर का वातावरण प्रभावित होता है, बल्कि आसपास के दुकानदारों और राहगीरों को भी परेशानी उठानी पड़ती है।अब जरूरत दावों की नहीं, जवाबदेही की है। नगर निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि मंदिरों से फूल उठाने की नियमित व्यवस्था क्या है, गलगला चौक के शिव मंदिर से आखिरी बार फूल कब उठाए गए और प्राकृतिक रंग बनाने की योजना के तहत अब तक कितना फूल एकत्र कर उसका वास्तविक उपयोग किया गया है।फूलों से रंग बनाने का सपना तभी साकार होगा, जब पहले मंदिरों से फूल समय पर उठेंगे। वरना योजना का रंग कागजों पर ही चढ़ा रहेगा और जमीन पर श्रद्धा के फूल सड़ते रहेंगे।