जबलपुर। शहर विकास के बड़े-बड़े दावों और स्मार्ट सिटी की चमकदार तस्वीरों के बीच आम नागरिक रोज़ाना बदहाल व्यवस्थाओं से जूझ रहा है। सड़कों पर रेंगता ट्रैफिक, जगह-जगह कचरे के ढेर, आवारा पशुओं का आतंक, लेफ्ट-राइट टर्न पर अतिक्रमण का जाल और लगातार बढ़ती महंगाई ने शहरवासियों का जीवन मुश्किल कर दिया है।
सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदारों की प्राथमिकता में आम जनता कब आएगी?
सुबह से शाम तक शहर के प्रमुख चौराहों और बाजारों में लंबा जाम अब सामान्य स्थिति बन चुकी है। लेफ्ट टर्न और राइट टर्न तक अतिक्रमण की चपेट में हैं, जिससे यातायात व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
दूसरी ओर, कई इलाकों में सड़क किनारे पड़े कचरे के ढेर स्वच्छता के दावों की पोल खोल रहे हैं। इन कचरे के ढेरों पर जमा आवारा मवेशी न केवल यातायात में बाधा बन रहे हैं, बल्कि दुर्घटनाओं का कारण भी बन रहे हैं।
उधर महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
निजी डेयरियों द्वारा दूध के दाम बढ़ाए जाने के बाद अब दूध आम परिवारों के बजट पर अतिरिक्त बोझ बन गया है। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, सब्जियां और रोजमर्रा की जरूरत का लगभग हर सामान महंगा हो चुका है।
घर का बजट संभालना मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। शहर में विकास और सुविधाओं के दावे लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन आम नागरिक पूछ रहा है कि जब सड़क पर जाम, गंदगी, अतिक्रमण और महंगाई से राहत नहीं मिल रही, तो विकास का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
लोगों का कहना है कि अब घोषणाओं से ज्यादा जरूरत जमीनी कार्रवाई की है। प्रशासन मस्त… जनता त्रस्त, यही चर्चा आज शहर के चौराहों, बाजारों और मोहल्लों में सबसे अधिक सुनाई दे रही है।