सुप्रीम कोर्ट से अब्दुल रज्जाक को मिली नियमित जमानत

जबलपुर। जबलपुर के हिस्ट्री चीटर अब्दुल रज्जाक को ओमती थाना क्षेत्र में वर्ष 2023 से जुड़े अपराधिक मामलें में सुप्रीम कोर्ट से नियमित जमानत की राहत मिल गई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अभियोजन के रुख में आए बदलाव तथा ट्रायल में संभावित विलंब को महत्वपूर्ण परिस्थितियां मानते हुए यह आदेश पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने रज्जाक को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन रिहा करने का निर्देश दिया है। मामले में रज्जाक की ओर से अधिवक्ता पवन रेले, अनमोल खेता और शरिक़ अकील फारूकी ने पक्ष रखा।

मामले की पिछली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को हुई थी। उस समय अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आश्वासन दिया था कि ट्रायल को शीघ्र पूरा कराने के उद्देश्य से गवाहों को दोबारा बुलाने संबंधी आवेदन पर अभियोजन आगे नहीं बढ़ेगा। यह आवेदन धारा 311 सीआपीसी धारा 348 बीएनएसएस के तहत प्रस्तुत किया गया था। अभियोजन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया था कि सह-आरोपी से संबंधित हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट के कारण ट्रायल की कार्यवाही बाधित नहीं होगी।

हालिया सुनवाई में अभियोजन की स्थिति पहले दिए गए आश्वासन से अलग नजर आई। अभियोजन ने गवाहों को पुनः बुलाने संबंधी आवेदन पर आगे बढ़ने की इच्छा जताई। साथ ही हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाने की बात भी कही गई। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के इस बदले रुख को ट्रायल में संभावित देरी के संदर्भ में देखा। अदालत के समक्ष यह स्थिति भी महत्वपूर्ण रही कि जिस प्रक्रिया को शीघ्र सुनवाई के लिए सीमित किया गया था, उसमें अब दोबारा विस्तार की संभावना बन रही थी।

कोर्ट ने ट्रायल शीघ्र पूरा करने के लिए पहले निर्धारित समय-सीमा और अभियोजन की ओर से दिए गए अंडरटेकिंग को समाप्त कर दिया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को भी स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि उसकी ओर से जानबूझकर ट्रायल में देरी करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। यदि याचिकाकर्ता की ओर से ट्रायल में विलंब कराने का प्रयास सामने आता है, तो अभियोजन अथवा ट्रायल कोर्ट को उचित आदेश के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाजी अब्दुल रज्जाक को नियमित जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है। उनकी रिहाई ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की जाने वाली शर्तों के अधीन होगी। इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर अभियोजन के बदले हुए रुख और उससे उत्पन्न संभावित देरी को ध्यान में रखा, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित किया कि आरोपी की ओर से ट्रायल को प्रभावित करने या अनावश्यक रूप से लंबा खींचने की स्थिति में अभियोजन के पास न्यायालय से उचित राहत लेने का रास्ता खुला रहे।