अयोध्या कांड के मंगलाचरण में यूं ही नहीं है द्वादस ज्योर्तिलिंग का गायन

रामभद्राचार्य जी ने की ‘राम जनम जग मंगल हेतू’ की अद्भुत व्याख्या
जबलपुर। आयुर्वेद कॉलेज मैदान में निर्मित अवधपुरी में चल रही श्रीरामकथा के छंटवे दिन मानस मर्मज्ञ, पद्म विभूषण, तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरू,रामानंदाचार्य श्री रामभद्राचार्य जी महाराज ने भगवान श्रीराम की वनलीला की चर्चा करते हुए भारत माता की भी उच्चतम व्याख्या की। उन्होंने कहा कि हमारे पास पांच प्राण हैं, लेकिन भारत माता के पास छह प्राण हैं। ये हैं सांख्य, योग, वैशैषिक, न्याय, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। उन्होंने सगर्व कहा कि हमारे शास्त्र भारतीय आध्यात्म मनीषा के प्राणाधार है।

समरसता सेवा संगठन द्वारा आयोजित रामकथा में उन्होंने कहा कि भक्ति भारत की आत्मा है और श्रीराम-कृष्ण भारत के परमात्मा। इनके अलावा जिनकी भी महिमा है, वे सब साधक हैं। महाराजश्री ने बताया कि मानसकार ने छहों दर्शनों को शास्त्र कहा, जिसका विवरण मानसजी की आरती में ‘छहउ शास्त्र सब ग्रंथन को रस’ के रूप में आता है। कथा की विषय वस्तु ‘राम जनम जग मंगल हेतू’ के माध्यम से महाराजश्री ने द्वाद्वस ज्योर्तिलिंग, 12 अमंगल, 12 मंगल, 12 दुष्टों को दंड, 12वर्ष के वनवास का अनोखा चिंतन प्रस्तुत किया।

*भक्ति और भगवान में अंतर नहीं -*

मन की आंखों से रामजी का दर्शन कर रामचरित मानस का अमृतांजन आंजने वाले महाराज श्री ने कहा कि जहां भारतीय दर्शन नहीं, वहां कुछ भी नहीं है। अत: सारी समस्याओं का समाधान वेदांत में देखना चाहिए। उन्होंने समझाया कि वेदांत का मतलब वेद के अंत से नहीं है। जब वेद अनंत हैं, तो उनका अंत कैसे हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जिस दर्शन में वेदों का सिद्धांत कहा गया है, वो है वेदांत। उन्होंने कहा कि वेद कहते हैं कि ब्रम्ह दो रूपों में विभाजित है। कारण ब्रम्ह और कार्य ब्रम्ह। कारण ब्रम्ह हमाारे रामजी हैं जबकि कार्य ब्रम्ह श्री सीताजी।  दोनों विशिष्ट हैं। इसलिए भगवान राम को मैंने सच्चिदानंद कहा और भगवती सीता को संबिदानंद हैं। उन्होंने कहा कि सीताजी को प्रकृति कभी नहीं मानना चाहिए। रामजी और सीताजी के रूप में एक ही ब्रम्ह ने दो स्वरूप धारण कर लिए। दर्शन के आधार पर जो लोग जानकी जी को प्रकृति मानते हैं, वो गलत हैं। लीला के लिए वे भक्ति का रूप धारण कर लेती हैं। भक्ति और भगवान में अंतर ही नहीं है। अयोध्याकांड के मंगलाचरण में द्वादस ज्योर्तिलिंग का दर्शन क्यों किया? इस पर उन्होंने कहा कि वनलीला में कैकई जी के द्वारा 12 अनर्थ किए गए। इसीलिए गोस्वामीजी ने वनलीला के मंगलाचरण में बारह अमंगलों को नष्ट करने के लिए द्वादस ज्योतिलर््िांग का वर्णन किया। इसके साथ ही वनलीला में भगवान ने 12 लोगों को मंगल किया।

*नर्मदा जी सुन रहीं हैं रामकथा -*

महाराजजी ने  ‘प्रथित पावन शास्त्र परंपरराम’ श्लोक के माध्यम से कहा कि वे प्रभु श्रीरामजी की कथा माता नर्मदा जी को सुना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह श्लोक मैंने नर्मदाजी से संवाद करते हुए रचित किया है। कथा में भारत के शास्त्रों की प्रथित पावन शास्त्र परंपरा है तो भैया लक्ष्मण और माता सीता का वैभव भी है। प्रभु श्री राघवेन्द्र सरकार की महिमा तो है ही। मैंने मां नर्मदा से कहा है कि हे मां नर्मदे आप प्रभु श्रीराम की कथा सुनिए। और, मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है कि मैया सूक्ष्म रूप से प्रभु की कथा सुन रही  हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी के काव्य को अनुपम बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत में चार प्रतिभाएं मुख्य हैं। भगवान बाल्मीक, महर्षि वेदव्यास महर्षि पाणिनी और गोस्वामी तुलसीदास। उन्होंने कहा कि साधारण कथा होती तो फिल्मी कथा और मानस कथा में क्या अंतर रह जाता। गोस्वामी जी ने रामचरित मानस के रूप में भारतीय दार्शनिक मनीषा की शाब्दिक व्याख्या की है। उन्होंने पुन: कहा कि कई कथावाचकों ने रामचरित मानस के अर्थों को अपने हिसाब से वर्णित कर अर्थ का अनर्थ किया है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा और मानस कथा की दुर्दशा करना सही नहीं है। मैं इसकी बात कहता हूं तो कहा जाता है कि निंदा कर रहा हूं। वस्तुत: निंदा का अर्थ ही नहीं जानते लोग। उन्होंने कहा कि गुणों में दोष कहना निंदा है। अब किसी में गुण ही नहीं है तो मैं कहां निंदा कर सकता हूं।

*परमात्मा सब कुछ है , और सबमें हैं -*

एक माताजी की जिज्ञासा ‘नेति-नेति क्या है’ का समाधान करते हुए महाराजश्री ने कहा कि ऐसा ही प्रश्न भारती जी ने आदि शंकराचार्य जी से किया था। उन्होंने कहा कि नेति-नेति शब्द वेदों से  लेकर मानस तक में आया है। मानस में कई बार यह शब्दावली आई है। नेति दो शब्दों से जुड़कर बना है, न और इति। विषय वस्तु समझाते हुए महाराजश्री ने कहा कि अब तो महिलाएं अपने पति का नाम लेने लगी है। पहले भारतीय कुलांगनाएं अपने पति का नाम नहीं लेती थीं। कोई पूछता था कि तुम्हारे पति का क्या नाम है, तो भिन्न-भिन्न बोलती हैैं। ये नाम है तो कहतीं नहीं, वो नाम है तो कहतीं नहीं। इसी प्रकार श्रुति परमात्मा के बारे में जो भिन्न-भिन्न पक्ष आते हैं, तो उनके बारे में इंकार करती हुई कहती है कि यह नहीं। मंडूक उपनिषद का जिक्र करते हुए उन्होंनें कहा कि श्रुति जीवन परमात्मा की येत्ता यानी यही है का निषेध करती है। और कहती है कि परमात्मा सब कुछ है, और सबमें है। तो क्या इतने हैं, ऐसा कभी नहीं कहना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईश्वर की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, इसी को नेति-नेति कहते हैं।

*सारी नदियां आज नर्मदाजी की अतिथि -*

कथा पूर्व विरदावली प्रस्तुत करते हुए तुलसी पीठ के युवराज आचार्य रामचंद्रदासजी महाराज ने कहा कि पूरे शहर को भक्तिमयी श्रीरामकथा आनंद की शीतलता  प्रदान कर रही है। एक साथ इतने सारे संतों का दर्शन करने का भी हम सबको यहां सौभाग्य मिल रहा है। हम सब तीर्थों में जाकर स्नान करते हैं, और इस भावना से वापस आते हैं कि अपना पाप इसी नदी के घाट पर छोड़ दिया है। लेकिन तीर्थों में इकट्ठा पाप का गठ्ठर भी प्रतीक्षा करता है।  ऐसे संतों का जिन्होंने बाल्यकाल से भगवान को भजा है कि वे एक बार यहां आकर डुबकी लगाएंगे तो हमारे भी पाप नष्ट हो जाएंगे। महाराजश्री के श्रीमुख से बह रही कथा सरिता ऐसी ही है, जिसमें पाप का गठ्ठर भी डुबकी लगा रहा है। इस समय सारी नदियां महाराजश्री के आमंत्रण पर रामकथा सुनने यहीं विराजमान है, सारी नदिया नर्मदा मैया की अतिथि हैं क्योंकि यहां मैया के तट पर महाराज श्री की कथा हो रही है। हम बड़भागी हैं जो ऐसी कथा के साक्षी बने हैं। महराजजी के शब्द किसी पुस्तक का पाठन नहीं होता, वह महाराजश्री के मन के भाव होते हैं।

संचालन करते हुए ब्रजेश दीक्षित ने कहा कि महाराजश्री ने आके पूरा महाकोशल धन्य कर दिया है। उनकी कथा प्रचार माध्यमों के द्वारा पूरे अंचल और विश्व भर में श्रद्धालु टीवी पर सुन रहे हैं। महाराजश्री ने श्रीरामचरित मानस का काव्यात्मक और दार्शनिक पक्ष अद्भुत तरीके से प्रस्तुत किया है। आपने बताया कि सच्चिदानंद के रूप में भगवान श्रीरामजी और श्री सम्मितानंद ब्रम्ह के रूप में जानकी जी प्रकट हुई।

*समरस रामायण चित्रावली देख भाव विभोर -*

आर्युवेद कॉलेज मैदान स्थित कथा परिसर में समरसता सेवा संगठन द्वारा आयोजित श्रीरामकथा पंडाल के समीप बड़े भूभाग में लगी समरस रामायण चित्रावली भी जनाकर्षण का केंद्र बनी हुई है। समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन और उनके सहयोगियों ने श्रीरामजी के जन्म से लेकर जीवन पर्यन्त उनकी लीलाओं से जुड़े प्रसंगों का यहां बड़ी बारीकी से विस्लेषण किया है। सुंदर शब्दावली, सुंदर चित्रावली रामभक्तों का चित्त चुरा रही है। परिसर के दर्शन मात्र से श्रद्धालु स्वयं को धन्य-धन्य अनुभव कर रहे हैं। चित्रावली में सुर-असुर का वृहद चित्रण किया गया है। विद्वान कह रहे हैं कि जिसने मानस नहीं पढ़ी,वो भी यह चित्रावली को देख कर रामजी के जीवन चरित्र को बेहतर ढंग से समझ सकता है।

पूजन का मंगल विधान तुलसी पीठ के आचार्य युवराज रामचंद्रदासजी ने सुखाचार्य द्वाराचार्य राघवदेवाचार्य जी की उपस्थिति में संपन्न कराया। पादुकापूजन करने के उपरांत सभी ने व्यास पीठ का पूजन कर महाराजश्री का स्वागत वंदन-अर्चन किया।
मंच पर विराजमान संत गण स्वामी गिरीशानंद जी महाराज, पगनालंद जी महाराज, कालिकानंद जी महाराज, मैत्रयी दीदी का आयोजन समिति के अध्यक्ष डा जितेन्द्र जामदार ने स्वागत किया।

*इन्होंने किया पादुकापूजन -*

कथा पूर्व रामानंद परंपरा की पादुका का पूजन पूर्व सांसद जयश्री बैनर्जी , सांसद श्रीमती सुमित्रा वाल्मिक की उपस्थिति में
विधायक अजय विश्नोई, समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन, आचार्य पं. वासुदेव शास्त्री, श्री रिंकू विज , श्री दीपांकर बैनर्जी ,श्रीमती मिताली बैनर्जी , श्री शंकर लाल खत्री , श्री सावल दास खत्री , श्री समन आसवानी शंभू भैया, कैलाश अग्रवाल बब्बा जी, पवन समदड़िया, मृगेन्द्र सिंह जी, विपिन बिहारी व्यौहार, दिनेश मीरा, पं. आशुतोष दीक्षित, लखन ताम्रकार,राकेश पाठक, सुशांक यादव ने समर्चन कर किया।

आचार्य वासुदेव शास्त्री, श्री मृगेन्द्र सिंह, श्री विपिन बिहारी व्यौहार , श्री आशुतोष दुबे , पंडित आशुतोष दीक्षित , लखन ताम्रकार , श्याम सुहाने , राकेश पाठक ने भी महाराजश्री का माल्यार्पण कर वंदन किया।

आज की कथा के विश्राम पर विधायक श्री सुशील तिवारी इंदु ,जस्टिस एच पी सिंह , पूर्व महापौर श्री प्रभात साहू, श्री अजीत समदडिया, प्रो.आशुतोष दुबे,, पंडित देवेन्द्र त्रिपाठी जी ,श्री रिकुंज विज रिंकू , सुधीर भागचंदानी, श्री विनय केसरवानी बबलू ,श्री विक्रम सिंह, श्री दीपक नौगरैया,श्री जय खत्री , श्री अनुरोध पटेरिया ,डॉ महेश प्रसाद नेमा , भोलाराम जी, अनिल तिवारी, महेश केसरवानी, भाजपा महामंत्री रंजीत पटेल ने आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।