कथा एक-सूत्र अनेक, रामकृपा को रामभद्राचार्य जी ने बताया महा अमृतांजन*

जबलपुर। तुलसी पीठाधीश्वर, पद्मविभूषण, रामानंदाचार्य, जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी महाराज की गौरीघाट आयुर्वेद कॉलेज मैदान में चल रही श्रीरामकथा सुन रहे श्रोताओं को नित्यप्रति जीवन जीने के सूत्र मिल रहे हैं। समरसता सेवा संगठन द्वारा आयोजित कथा मे मानस के एक-एक प्रसंग को महाराजश्री आज के संदर्भ से जोड़कर बड़ी सरस व्याख्या कर रहे हैं। आज अहिल्या प्रसंग में महाराजश्री ने अहिल्या माता का वर्णन तो किया ही, साथ ही बताया कि वैसी स्थिति कई बार मानव मन की भी देखी जाती है। अहिल्या के जीवन में मोह भी है, अंधकार भी है, और दुर्भाग्य भी है। ये तीनों बिना प्रभू कृपा के नहीं जाते।

उन्होंने कहा कि राम जी की चरण धूल जीवन का अमृतांजन है, और इसके लिए सबको प्रयास करना चाहिए।  ‘रामकृपा जग मंगल हेतू’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि प्रभू श्रीराम का जनम जब पूरे जगत के मंगल के लिए हुआ है, तब हमारा मंगल भला क्यों नहीं हो सकता।  महाराजश्री ने बताया कि रामजी ने पिता से कैसा व्यवहार करें, भाई के साथ कैसे संबंध रखें, गुरु का किस तरह सम्मान करें, यज्ञ की रक्षा कैसे करें, ये सब हमें सिखाया है। उन्होंने कहा कि अहिल्या के भीतर के नेत्र बंद हो गए थे। उन्होंने बताया कि ज्ञान और वैराग्य भीतर के दो नेत्र हैं। जब प्रभु कृपा होती है, तभी ये नेत्र मिलते हैं। जब मन की आंख खुलती है तभी जीवन में भव-भय के दोष मिटते हैं। रामचरित मानस के चतुर चितेरे पूज्यश्री ने कहा कि विश्वामित्रजी ने अयोध्या आकर प्राश्चित किया क्योंकि राम जनम जग मंगल हेतु। भगवान ने उनके प्राश्चित को सफल करा उनका मंगल कर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वामित्र जी अयोध्या दो बार आए। एक बार हरिश्चंद्र्र के कार्यकाल में और फिर रामचंद्र के कार्यकाल में। हरिश्चंद्र्र जी के समय विश्वामित्र जी ने उनकी पत्नी को उनसे अलग कर दिया था। उसका प्राश्चित रामचंद्र जी के कार्यकाल में हुआ। हरिश्चंद्र्र जी से विश्वामित्र जी ने उनकी पत्नी अलग की थी, रामचंद्रजी से उनकी पत्नी को मिला दिया। उन्होंने कहा कि महाराज दशरथ को चिंतित देख उन्होंने कहा कि उस बार मैं परीक्षा लेने आया था, इस बार परीक्षा देने आया हूं। तब राज्य लेने आए थे अब राजा रामजी को लेने आए हैं। उन्होंने अनुज समेत रघुनाथ जी को दशरथ जी से मांग लिया।

गुरु का भी प्रभु ने किया मंगल –
विषय चौपाई राम जनम जग मंगल हेतू का गान करते हुए महाराजश्री ने कहा कि प्रभु श्रीराम ने अपने गुरु का भी मंगल किया। वशिष्ठ जी ने स्वयं कहा कि मेरी पर्णकुटी में निवास करते हुए, अपने गुणों से, अपनी भक्ति से, अपने व्यवहार से, विनय से सुशोभित कोमल व्यवहार से और अपने मन से मेरे मन का हरण करके श्रीराम ने मुझे अपने वश में कर लिया। वशिष्ठ जी का मंगल विश्वामित्र जी ने देख लिया। वस्तुत: उनका मंगल देख कर ही विश्वामित्र जी को लगा कि मेरा अमंगल रुक नहीं रहा है, इसी को लेकरउनके मन में चिंता हुई, और गोस्वामी जी ने गाधितनय मन चिंता व्यापी चौपाई लिखी। विश्वामित्र जी को विश्वास था कि जैसा मंगल वशिष्ठ जी का हुआ, वैसा मंगल मेरा भी होगा। और हुआ भी ऐसा क्योंकि भगवान का जन्म ही मंगल के लिए हुआ



*विद्या को धारण करने का नाम निधि -*

महाराज श्री ने एक प्रश्न के समाधान में कहा कि गोस्वामी जी ने बहुत सोच के लिखा ‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई अल्प काल विद्या सब आई’। रामजी में थोड़े समय में ही सब विद्या आ गई और आने के बाद उन्होंने विद्या धारण किया। जो विद्या आए और आने के बाद धारण हो जाए वो निधि हो जाती है। जिसमें विद्याएं निवास करती हैं, उसे कहते हैं निधि। सभी विद्या रामजी में हैं, फिर भी उनके पास विद्या का अहंकार नहीं था। महाराजश्री ने कहा कि विद्या के आठ लक्षण होते हैं। सुनने की इच्छा, ध्यान से सुनना, ग्रहण करना, जो सुना वो धारण करना, उहापोह अर्थात उर में रखना, अर्थ विज्ञान करना  ही विद्या की निधि है।

*जब जज बोले आप मेरे लिए डिवाइन पावर -*

महाराजश्री ने कहा कि संतों में उपासना संबंधी मतभेद भले हो, लेकिन जब राष्ट्र हित की बात आए तो सभी कसे एकजुट हो जाना चाहिए। मानस यह सिखाती भी है। उन्होंने कहा कि वशिष्ठ जी का विश्वामित्र से बहुत विरोध है, पर अयोध्या हित के लिए उन्होंने दशरथजी को समझाया कि राम इन्हें प्रदान कर दो। और दशरथजी के नौ विकल्पों में हर विकल्प में उन्होंने रामजी को दख दिया। तब दशरथजी को रामजी उन्हें देने पड़े। महाराजश्री ने अयोध्या का जिक्र करते हुए कहा कि अयोध्याजी के मुकदमे में मैंने कोर्ट को 441 प्रमाण दिए थे, खुदाई करने पर वे सभी 441 की प्रमाण मिले। तब मुस्लिम जज ने मुझसे कहा सर, यू आर डिवाइन पावर। उन्होंने बताया कि अयोध्या जन्मभूमि के लिए मैंने, नृत्यगोपालदासजी, अवैद्य नाथजी, रामचंद्र परमहंच के साथ मिल कर आंदोलन किया था। कोर्ट में बतौर रामजी के गुरुवंश के तहत प्रमाण रखे। उन्होंने कहा कि वह राष्टÑहित के साथ मेरे आराध्य का मामला था।

*समाज के लिए जीना ही सार्थक -*

कथा पूर्व तुलसी पीठ चित्रकूट के युवराज आचार्य रामचंद्रदास जी ने कहा कि जो हम समाज के लिए जीते हैं, वही जीवन सार्थक होता है। अपनी संस्कृति अपनी संसकृत अपनी सनातन के लिए जो प्रतिदान करता है, वो समाज के लिए सार्थक हो जाता है। पूज्य गुरुदेव जब भारतीय संस्कृति संरक्षण के लिए इतना बड़ा काम कर रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य है हम उसमें अपना योगदान दें। महाराजश्री के गुरुकुलम के लिए आज संस्कारधानी से विधायक अशोक रोहाणी 11 लाख, किशोरी सिंह लोधी दो लाख, अशोक अग्रवाल गढ़ाफाटक 1 लाख, संदीप जायसवाल एक  लाख, गुप्तदान 1 लाख की राशि समर्पित की गई।

*इन्होंने किया पादुका पूजन -*

कथा के पूर्व रामानंदा पीठ की चरण पादुकाओं का पूजन-अर्चन
सांसद श्रीमति सुमित्रा वाल्मिक,सेवा निवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास ,  डॉ राजेश धीरवानी, कैलाश चन्द्र जैन,किशोर सिंह लोधी ,अजय गुप्ता , अनूप खंडेलवाल ने समर्चन कर किया।
पूजन का मंगल विधान तुलसी पीठ के आचार्य युवराज रामचंद्रदासजी ने सुखाचार्य द्वाराचार्य राघवदेवाचार्य जी की उपस्थिति में संपन्न कराया। पादुकापूजन करने के उपरांत सभी ने व्यास पीठ का पूजन कर महाराजश्री का स्वागत वंदन-अर्चन किया।

*श्रीराम जानकी विवाह का अवसर -* आज की कथा में भगवान श्रीराम एवं माता जानकी के विवाह का अवसर था, पूज्य जगद्गुरु के श्रीमुख विवाह का वाचन हुआ। पूज्य वाणी को सुनकर श्रोता झूम उठे। मंच पर विवाह उत्सव मनाया गया।

महामहोपाध्याय डॉ हरिशंकर दुबे , के के अग्रवाल , अशोक अग्रवाल , थानेश्वर महावर, शरद काबरा, बृज बिहारी शर्मा, मुन्ना महाराज ने भी महाराजश्री का माल्यार्पण कर वंदन किया।

मंचासीन पूज्य संत परमहंस स्वामी गिरीशानंद जी महाराज , स्वामी अखिलेश्वरानंद ,स्वामी  बालगोविन्दाचार्य जी महाराज, का स्वागत डॉ जितेन्द्र जामदार, संदीप जैन  ने किया।

आज की कथा के विश्राम पर  लेखराज सिंह , डॉ पवन स्थापक, सुखवीर कोचर , अशोक रंगा,अनिल तिवारी , कपिल द्विवेदी, प्रवेश खेड़ा,विष्णु पटेल , संजय भाटिया ने आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।