जबलपुर। गौरीघाट के आर्युवेद कॉलेज मैदान में चल रही श्रीरामकथा का तृतीय दिवस आज तब इतिहास में लिख गया जब श्रीरामजी के प्राकट्य की हूबहू अयोध्या सी अनुभूति उपस्थित जनमेदिनी ने अनुभव की। मनु महाराज की कथा प्रसंग में कथा व्यास पद्म विभूषण, तुलसी पीठाधीश्वर, जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी ने बड़े भाव से ‘अस मन होत उठाय लेऊं कुरवा..उठाए लेऊंकरवा…लगाय लेऊं हियरवा’ भजन से परमात्मा राम के बालरूप को साकार कर दिया। करवा का अर्थ गोद से था। महाराजश्री के भाव में सब ऐसे विभोर हुए कि मानो उनकी ही गोद में श्रीरामजी ही आ गए हों।
समरसता सेवा संगठन के सौजन्य से हो रही कथा में संगठन की टीम ने पूरे पंडाल का अनोखा पुष्प-वैलून श्रृंगार किया। भगवान श्रीराम के बाल स्वरूप की सजीव झांकी के दर्शन सभी ने की। रामलला का जन्म सभी ने नाच गाके उत्सव के रूप में मनाया। रामजी के जन्म के समय में आसमान से मेघ गर्जन और धरा पर मंत्र उच्चारण हो रहा था। मानस के सरस वक्ता महाराजश्री ने ‘सत्यसंध पालक श्रुति सेतू-रामजनमजग मंगल हेतू’ को मंच पर सजीव कर लिया। अवधपुरी में ‘जय-जय सुरनायक-जनसुख दायक प्रणतपाल भगवंता’ संकीर्तन के साथ भगवान प्रकट हुए।
सविस्तार सुनाई श्रीराम जन्म की कथा –
महाराजश्री ने भगवान श्रीराम के मंगलकारी जन्म से जुड़ी सभी कथाएं पूरे मनोयोग से सुनाई । जय-विजय, नारद प्रसंग, वृंदा प्रसंग के माध्यम से उन्होंने आध्यात्म के गूढतम रहस्य प्रकट किए। उन्होंन बताया कि ‘राम भगत जग चार प्रकारा’ चौपाई यूं ही नहीं लिखी गई। राम भगतों के चार प्रकार हैं। ये हैं आर्त, जिज्ञास, अर्थाती और ज्ञानी। आर्त की कथा जय विजय कल्प में, जिज्ञासु की कथा वृंदा कल्प में, अर्थाती की कथा नारद प्रसंग में और चौथी कथा ज्ञानी की मनु के रूप में आती है। उन्होंने बताया कि ज्ञानी का अर्थ है ईश्वर सेव्य है मैं सेवक हूं, इसी भाव को ज्ञानी कहते हैं। ज्ञान धारा के परम आचार्य महाराज मनु हैं। मनु ने 24 हजार वर्ष तपस्या क्यों की। इसका उत्तर बताते हुए महाराजश्री ने कहा कि क्योंकि मनु को भगवान के 24 जन्म का संपूर्ण स्वरूप चाहिए था। उन्होंने कहा कि हम सोने में 24 कैरेट सोने की मांग करते हैं। हमारे राम जी ऐसे ही 24 कैरेट स्वर्ण है, जो संपूर्णता का प्रतीक हैं। अंग्रेजों ने गॉड की जो व्याख्या करते हुए कहा कि जिसमें जीओडी तीनों रहें वही ईश्वर है। यही बात मेरी भी है। र माने रामेश्वर, अ माने ब्रम्हा, म माने महेश्वर। तीनों जहां रहते हैं वही हैं राम। जिनके एक-एक अंश से करोड़ों ब्रम्हा, करोड़ों शंकर, करोड़ों विष्णु उत्पन्न होते हैं, ऐसे हैं हमारे राम। उन्होंने दो टूक कहा कि मेरा निश्चिय है कि श्रीराम इन तीनों देवों से ऊपरी और परे की सत्ता हैं। हम निश्चय कर चुके हैं।
रामजी ज्ञान के प्रतीक नहीं ज्ञान के स्वरूप –
आज की कथा में महाराजश्री ने पदार्थवाद पर चिंतन करते हुए कहा कि प्रतीकवाद को ईश्वर के साथ जोड़ना सही नहीं है। ईश्वर प्रतीक में नहीं रहता। हम राम जी को ज्ञान का लक्ष्मण जी को वैराग्य का प्रतीक नहीं कह सकते। उन्होंने कहा कि रामजी ज्ञान के प्रतीक नहीं बल्कि ज्ञान के स्वरूप हैं। भगवान राम का नाम जगत का प्रथम मंगल है। जब नाम मंगल है तो उनका रूप भी मंगल है। उन्होंने ‘बाल्मीक उर आनंद भारी-मंगल मूरति नयन निहारी’ नामक चौपाई के माध्यम से भगवान श्रीराम के मंगल रूप को रेखांकित किया। उनके सेवक हनुमान जी भी मंगल मूरत हैं। तो जहां-जहां राम हैं, वहां-वहां मंगल है। रावण की उपस्थित अमंगलकारी है। जो सबको रुलाए वो रावण और जो सबको रमा लेता है वो रावण है। रामजी सबको मंगल ही देते रहते हैं। श्रोताओं से मुखाबित महाराज श्री ने कहा कि कथा श्रवण का फलादेश मोह का जाना है। कथा सुनने से मोह से मुक्ति मिल जाता है।
रामकथा सबको गानी चाहिए –
महाराजश्री ने आज की कथा का श्रीगणेश ‘प्रथित पावन शास्त्र परंपराम-लषित लक्ष्मण जानकी वैभवाम, ललित मानस भाव मनोहराम-गिरिधरस्य गिरम सृणो नर्मदे’ श्लोक से किया। चिरपरिचित ‘सीताराम जय सीताराम’ संकीर्तन ने कथा पंडाल का वातावरण राममय कर दिया। उन्होंने कहा कि नर्मदा माई की गोद में बैठकर हम समरसता सेवा संगठन के संयोजन में ‘राम जनम जग मंगल हेतू’ चौपाई पर कथा करके बहुत अच्छा लग रहा है। भगवान के गाने से जो सुख मिलता है, वो कहीं मिलता नहीं है। हम सबको भगवान को गाना ही चाहिए। श्रीरामचरित मानस को तीन लोगों ने गाया। वाल्मीकी ने गाया, उन्हें पिक कहा गया। श्री हनुमानजी ने गाया तो उन्हें कपि कहा गया । एक वक्ता पीपी कर गाता है तो एक गा गा कर पीता है। बिना गाए कल्याण नहीं है। अत: सबको रामकथा गानी ही चाहिए। बिना गाए कथा में आनंद नहीं आता।
आप जहां भेज देंगे वहीं जाएंगे –
रामचरित के सरस वक्ता महाराजश्री ने राम चरणों में अनुराग की व्याख्या जय-विजय के चरित्र से जोड़ कर के कही। उन्होंने कहा कि ज्भगवान के द्वारपाल जय विजय ने सनकादिक को भगवान से मिलने से रोका तो जय-विजय का अमंगल हो गया। इस ब्रम्हदंड को उनके हथियार भी समाप्त नहीं कर पाए, वे स्वर्ग से नीचे गिर गए। बाद में उन्हें मालुम हुआ कि ये आशीर्वाद है। भगवान के प्रति प्रेम हो तो अमंगल में भी मंगल की स्थिति होती है। जय-विजय की स्थित पर महाराजश्री ने गीत गाया ‘आप जहां भेज देंगे वहीं जाएंगे-वहीं जाकर के हरि गुण गाएंगे’। चाहे शूकर बने चाहे कूकर बनें-चाहे किन्नर बनें चाहे निशिचर बनें, आप जो भी बना देंगे बन जाएंगे..वही बन कर के हरि गुण गाएंगे। महाराजश्री ने बताया कि भगवान के प्रेम में जीव का कभी अमंगल नहीं होता। जहां-जहां अमंगल दिखा, वहीं बाद में मंगल के रूप में सामने आया। वृंदा की कथा, नारद की कथा में अमंगल दिखा, पर उससे हुआ मंगल ही।
ज्ञान नष्ट हो जाता है भजन नहीं –
महाराजश्री ने कहा कि ज्ञान नष्ट हो सकता है, पर भजन का बीज पूरी तरह नष्ट नहीं होता। वह अंत:करण में बना रहता है। जीव में यदि ज्ञान है, पर रामजी के प्रति प्रेम नहीं है, तो ऐसा ज्ञान डूबेगा ही। शिव जी ने पार्वती जी से कहा है कि जगत सपना है, पर सत भगवान का भजन ही है। नारद जी की कथा में यह बात देखने मिलती है। उनमें ज्ञान था, पर भगवान के प्रति प्रेम नहीं था, इस कारण उन्हें गिरने पड़ा। उन्होंने कहा कि ज्ञाान के संस्कार मिटते हैं, पर भजन के संस्कार नहीं मिटते। भगवान के भजन का एक स्वभाव होता है कि जो भगवान का भजन करता है, उसे भगवान कभी गिरने नहीं देते। गिर भी जाता है तो भगवान उसे बचा लेते हैं। नारदजी के मुख से निकला कि जिस में मेरा हित हो वह करें। भगवान ने जैसे ही ये सुना तो कहा मैं हित नहीं तुम्हारा परम हित करूंगा। भगवान ने नारद जी को हनुमानजी का मुखड़ा दे दिया तो नारद जी का अमंगल मिट गया।
शिवजी के हृदय से निकली राम धारा –
कथा पूर्व तृतीय दिवस की प्रस्तावना व्यक्त करते हुए तुलसी पीठ के उत्तराधिकारी आचार्य युवराज रामचंद्र दास जी ने कहा कि वर्तमान में दो धाराएं चल रही है। एक ओर सबको तारने वाली शिवपुत्री नर्मदाजी की अविरल धारा बह रही है। दूसरी ओर शंकरजी के हृदय से जो रामधारा निकल रही है, वह व्यासपीठ से महाराज श्री प्रवाहित कर रहे हैं। महाराजश्री राम कथा को सुनाते बस नहीं है, वे रामकथा को जीते हैं। उनके निकट जाकर देखने पर लगता है कि एक ग्रहस्थ का जितना वात्सल्य अपने पुत्र-पुत्री से होता है, उससे कई गुना अधिक प्रेम महाराजश्री का राघवजी में नजर आता है। राघवेंद्र सरकार को सुबह उठाने से लेकर सुलाने तक का अद्भुत दृश्य हमारे सामने उपलब्ध होता है। गुरुदेव ने अपने मानस पटल में कई रामकथा के कई आयाम रख रखे हैं। जैसे पूजा में हम बासे फूल नहीं चढ़ाते, उसी तरह महाराजश्री जब हनुमानजी को कथा सुनाते हैं, तो नए भाव से ही सुनाते हैं।
इन्होंने किया पादुका पूजन –
शुरुआत में सुखानंद द्वाराचार्य, राघवदेवाचार्य की उपस्थ्तिि में तुलसी पीठ के युवराज आचार्य रामचंद्रदासजी ने पादुका पूजन का मंगल विधान संपन्न कराया। मंच पर उपस्थित स्वामी गिरीषानंद जी, साध्वी ज्ञानेश्वरी जी, संत रामभारती जी का अभिनंदर समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन ने किया।शहर के प्रथम नागरिक महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू ने सपत्नीक पादुका पूजन किया। प्रतिदिन की भांति आचार्य रोहित दुबे , सौरभ दुबे के मार्गदर्शन में आचार्य गणों के साथ यजमानों द्वारा विधिवत पूजन एवं सहस्त्रार्चन किया गया, इस अवसर पर कथा यजमान प्रकाश धीरावाणी, डॉ. जितेन्द्र जामदार, समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन, अखिल मिश्रा, सुरेश आसवानी , तारु खत्री , राजू हिरानी, बब्वल रजक, राजू चौरसिया, सुशील सोनी, सहित अन्य उपस्थित रहे। मंच संचालन ब्रजेश दीक्षित ने किया।
श्रीराम कथा व्यास पीठ की श्रीमती माला राकेश सिंह, लेखराज सिंह, श्रीमती सुजाता सिंह प्रवीण वर्मा ने सपत्नी, संदीप जैन, आरती की।
रामकथा पूरे समाज के लिए पाथेय –
संचालन करते हुए पं. ब्रजेश दीक्षित ने कहा कि श्रीराम जनम जग मंगल हेतु के संबंध में महारजाश्री ने जो शास्त्र सम्मत व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, वह हम सबके लिए पाथेय है। महाराजश्री के वचन व्यासों के लिए उपजीय तो है ही, संपूर्ण समाज के लिए भाी पाथेय भी हैं। उन्होंने राम जनम के मंगल होने संबंधी कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उद्घाटित किया है। मानस जगत में चार तरह के वाद हैं। रस वाद बिंदुजी ने वृंदावन से चलाया। युक्तिवाद काशी के विद्वानों ने संगति वाद अयोध्या के संतों ने, और प्रतीक वाद परंपरा चलाई साकेतवासी रामकिंकर जी ने। ओर चित्रकूट से पदार्थवाद की पांचवी परंपरा चलाई। वर्तमान युग रामभद्राचार्यजी के नाम पर हैं। अभी चूंकि पदार्थ वाद चल रहा। मानस के प्रत्येक पद का क्या उपयोग हो सकता है, यह महाराज श्री की वाणी से मिलता है। महाराजश्री ने बताया है कि हमारे कंठ में भी मालकोष है, रामकथा उसका भी उदाहरण बनती है।
सादर प्रकाशनार्थ
श्रीकांत साहू
रामकथा समन्वयक
अयोध्या से उत्सव में अवधपुरी में जन्मे रामलला श्रीराम कथा के तृतीय दिवस प्रभु रामलला का जन्म
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जबलपुर। गौरीघाट के आर्युवेद कॉलेज मैदान में चल रही श्रीरामकथा का तृतीय दिवस आज तब इतिहास में लिख गया जब श्रीरामजी के प्राकट्य की हूबहू अयोध्या सी अनुभूति उपस्थित जनमेदिनी ने अनुभव की। मनु महाराज की कथा प्रसंग में कथा व्यास पद्म विभूषण, तुलसी पीठाधीश्वर, जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी ने बड़े भाव से ‘अस मन होत उठाय लेऊं कुरवा..उठाए लेऊंकरवा…लगाय लेऊं हियरवा’ भजन से परमात्मा राम के बालरूप को साकार कर दिया। करवा का अर्थ गोद से था। महाराजश्री के भाव में सब ऐसे विभोर हुए कि मानो उनकी ही गोद में श्रीरामजी ही आ गए हों।
समरसता सेवा संगठन के सौजन्य से हो रही कथा में संगठन की टीम ने पूरे पंडाल का अनोखा पुष्प-वैलून श्रृंगार किया। भगवान श्रीराम के बाल स्वरूप की सजीव झांकी के दर्शन सभी ने की। रामलला का जन्म सभी ने नाच गाके उत्सव के रूप में मनाया। रामजी के जन्म के समय में आसमान से मेघ गर्जन और धरा पर मंत्र उच्चारण हो रहा था। मानस के सरस वक्ता महाराजश्री ने ‘सत्यसंध पालक श्रुति सेतू-रामजनमजग मंगल हेतू’ को मंच पर सजीव कर लिया। अवधपुरी में ‘जय-जय सुरनायक-जनसुख दायक प्रणतपाल भगवंता’ संकीर्तन के साथ भगवान प्रकट हुए।
*सविस्तार सुनाई श्रीराम जन्म की कथा -*
महाराजश्री ने भगवान श्रीराम के मंगलकारी जन्म से जुड़ी सभी कथाएं पूरे मनोयोग से सुनाई । जय-विजय, नारद प्रसंग, वृंदा प्रसंग के माध्यम से उन्होंने आध्यात्म के गूढतम रहस्य प्रकट किए। उन्होंन बताया कि ‘राम भगत जग चार प्रकारा’ चौपाई यूं ही नहीं लिखी गई। राम भगतों के चार प्रकार हैं। ये हैं आर्त, जिज्ञास, अर्थाती और ज्ञानी। आर्त की कथा जय विजय कल्प में, जिज्ञासु की कथा वृंदा कल्प में, अर्थाती की कथा नारद प्रसंग में और चौथी कथा ज्ञानी की मनु के रूप में आती है। उन्होंने बताया कि ज्ञानी का अर्थ है ईश्वर सेव्य है मैं सेवक हूं, इसी भाव को ज्ञानी कहते हैं। ज्ञान धारा के परम आचार्य महाराज मनु हैं। मनु ने 24 हजार वर्ष तपस्या क्यों की। इसका उत्तर बताते हुए महाराजश्री ने कहा कि क्योंकि मनु को भगवान के 24 जन्म का संपूर्ण स्वरूप चाहिए था। उन्होंने कहा कि हम सोने में 24 कैरेट सोने की मांग करते हैं। हमारे राम जी ऐसे ही 24 कैरेट स्वर्ण है, जो संपूर्णता का प्रतीक हैं। अंग्रेजों ने गॉड की जो व्याख्या करते हुए कहा कि जिसमें जीओडी तीनों रहें वही ईश्वर है। यही बात मेरी भी है। र माने रामेश्वर, अ माने ब्रम्हा, म माने महेश्वर। तीनों जहां रहते हैं वही हैं राम। जिनके एक-एक अंश से करोड़ों ब्रम्हा, करोड़ों शंकर, करोड़ों विष्णु उत्पन्न होते हैं, ऐसे हैं हमारे राम। उन्होंने दो टूक कहा कि मेरा निश्चिय है कि श्रीराम इन तीनों देवों से ऊपरी और परे की सत्ता हैं। हम निश्चय कर चुके हैं।
*रामजी ज्ञान के प्रतीक नहीं ज्ञान के स्वरूप -*
आज की कथा में महाराजश्री ने पदार्थवाद पर चिंतन करते हुए कहा कि प्रतीकवाद को ईश्वर के साथ जोड़ना सही नहीं है। ईश्वर प्रतीक में नहीं रहता। हम राम जी को ज्ञान का लक्ष्मण जी को वैराग्य का प्रतीक नहीं कह सकते। उन्होंने कहा कि रामजी ज्ञान के प्रतीक नहीं बल्कि ज्ञान के स्वरूप हैं। भगवान राम का नाम जगत का प्रथम मंगल है। जब नाम मंगल है तो उनका रूप भी मंगल है। उन्होंने ‘बाल्मीक उर आनंद भारी-मंगल मूरति नयन निहारी’ नामक चौपाई के माध्यम से भगवान श्रीराम के मंगल रूप को रेखांकित किया। उनके सेवक हनुमान जी भी मंगल मूरत हैं। तो जहां-जहां राम हैं, वहां-वहां मंगल है। रावण की उपस्थित अमंगलकारी है। जो सबको रुलाए वो रावण और जो सबको रमा लेता है वो रावण है। रामजी सबको मंगल ही देते रहते हैं। श्रोताओं से मुखाबित महाराज श्री ने कहा कि कथा श्रवण का फलादेश मोह का जाना है। कथा सुनने से मोह से मुक्ति मिल जाता है।
*रामकथा सबको गानी चाहिए -*
महाराजश्री ने आज की कथा का श्रीगणेश ‘प्रथित पावन शास्त्र परंपराम-लषित लक्ष्मण जानकी वैभवाम, ललित मानस भाव मनोहराम-गिरिधरस्य गिरम सृणो नर्मदे’ श्लोक से किया। चिरपरिचित ‘सीताराम जय सीताराम’ संकीर्तन ने कथा पंडाल का वातावरण राममय कर दिया। उन्होंने कहा कि नर्मदा माई की गोद में बैठकर हम समरसता सेवा संगठन के संयोजन में ‘राम जनम जग मंगल हेतू’ चौपाई पर कथा करके बहुत अच्छा लग रहा है। भगवान के गाने से जो सुख मिलता है, वो कहीं मिलता नहीं है। हम सबको भगवान को गाना ही चाहिए। श्रीरामचरित मानस को तीन लोगों ने गाया। वाल्मीकी ने गाया, उन्हें पिक कहा गया। श्री हनुमानजी ने गाया तो उन्हें कपि कहा गया । एक वक्ता पीपी कर गाता है तो एक गा गा कर पीता है। बिना गाए कल्याण नहीं है। अत: सबको रामकथा गानी ही चाहिए। बिना गाए कथा में आनंद नहीं आता।
*आप जहां भेज देंगे वहीं जाएंगे -*
रामचरित के सरस वक्ता महाराजश्री ने राम चरणों में अनुराग की व्याख्या जय-विजय के चरित्र से जोड़ कर के कही। उन्होंने कहा कि ज्भगवान के द्वारपाल जय विजय ने सनकादिक को भगवान से मिलने से रोका तो जय-विजय का अमंगल हो गया। इस ब्रम्हदंड को उनके हथियार भी समाप्त नहीं कर पाए, वे स्वर्ग से नीचे गिर गए। बाद में उन्हें मालुम हुआ कि ये आशीर्वाद है। भगवान के प्रति प्रेम हो तो अमंगल में भी मंगल की स्थिति होती है। जय-विजय की स्थित पर महाराजश्री ने गीत गाया ‘आप जहां भेज देंगे वहीं जाएंगे-वहीं जाकर के हरि गुण गाएंगे’। चाहे शूकर बने चाहे कूकर बनें-चाहे किन्नर बनें चाहे निशिचर बनें, आप जो भी बना देंगे बन जाएंगे..वही बन कर के हरि गुण गाएंगे। महाराजश्री ने बताया कि भगवान के प्रेम में जीव का कभी अमंगल नहीं होता। जहां-जहां अमंगल दिखा, वहीं बाद में मंगल के रूप में सामने आया। वृंदा की कथा, नारद की कथा में अमंगल दिखा, पर उससे हुआ मंगल ही।
*ज्ञान नष्ट हो जाता है भजन नहीं -*
महाराजश्री ने कहा कि ज्ञान नष्ट हो सकता है, पर भजन का बीज पूरी तरह नष्ट नहीं होता। वह अंत:करण में बना रहता है। जीव में यदि ज्ञान है, पर रामजी के प्रति प्रेम नहीं है, तो ऐसा ज्ञान डूबेगा ही। शिव जी ने पार्वती जी से कहा है कि जगत सपना है, पर सत भगवान का भजन ही है। नारद जी की कथा में यह बात देखने मिलती है। उनमें ज्ञान था, पर भगवान के प्रति प्रेम नहीं था, इस कारण उन्हें गिरने पड़ा। उन्होंने कहा कि ज्ञाान के संस्कार मिटते हैं, पर भजन के संस्कार नहीं मिटते। भगवान के भजन का एक स्वभाव होता है कि जो भगवान का भजन करता है, उसे भगवान कभी गिरने नहीं देते। गिर भी जाता है तो भगवान उसे बचा लेते हैं। नारदजी के मुख से निकला कि जिस में मेरा हित हो वह करें। भगवान ने जैसे ही ये सुना तो कहा मैं हित नहीं तुम्हारा परम हित करूंगा। भगवान ने नारद जी को हनुमानजी का मुखड़ा दे दिया तो नारद जी का अमंगल मिट गया।
*शिवजी के हृदय से निकली राम धारा -*
कथा पूर्व तृतीय दिवस की प्रस्तावना व्यक्त करते हुए तुलसी पीठ के उत्तराधिकारी आचार्य युवराज रामचंद्र दास जी ने कहा कि वर्तमान में दो धाराएं चल रही है। एक ओर सबको तारने वाली शिवपुत्री नर्मदाजी की अविरल धारा बह रही है। दूसरी ओर शंकरजी के हृदय से जो रामधारा निकल रही है, वह व्यासपीठ से महाराज श्री प्रवाहित कर रहे हैं। महाराजश्री राम कथा को सुनाते बस नहीं है, वे रामकथा को जीते हैं। उनके निकट जाकर देखने पर लगता है कि एक ग्रहस्थ का जितना वात्सल्य अपने पुत्र-पुत्री से होता है, उससे कई गुना अधिक प्रेम महाराजश्री का राघवजी में नजर आता है। राघवेंद्र सरकार को सुबह उठाने से लेकर सुलाने तक का अद्भुत दृश्य हमारे सामने उपलब्ध होता है। गुरुदेव ने अपने मानस पटल में कई रामकथा के कई आयाम रख रखे हैं। जैसे पूजा में हम बासे फूल नहीं चढ़ाते, उसी तरह महाराजश्री जब हनुमानजी को कथा सुनाते हैं, तो नए भाव से ही सुनाते हैं।
*इन्होंने किया पादुका पूजन -*
शुरुआत में सुखानंद द्वाराचार्य, राघवदेवाचार्य की उपस्थ्तिि में तुलसी पीठ के युवराज आचार्य रामचंद्रदासजी ने पादुका पूजन का मंगल विधान संपन्न कराया। मंच पर उपस्थित स्वामी गिरीषानंद जी, साध्वी ज्ञानेश्वरी जी, संत रामभारती जी का अभिनंदर समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन ने किया।शहर के प्रथम नागरिक महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू ने सपत्नीक पादुका पूजन किया। प्रतिदिन की भांति आचार्य रोहित दुबे , सौरभ दुबे के मार्गदर्शन में आचार्य गणों के साथ यजमानों द्वारा विधिवत पूजन एवं सहस्त्रार्चन किया गया, इस अवसर पर कथा यजमान प्रकाश धीरावाणी, डॉ. जितेन्द्र जामदार, समरसता सेवा संगठन के अध्यक्ष संदीप जैन, अखिल मिश्रा, सुरेश आसवानी , तारु खत्री , राजू हिरानी, बब्वल रजक, राजू चौरसिया, सुशील सोनी, सहित अन्य उपस्थित रहे। मंच संचालन ब्रजेश दीक्षित ने किया।
श्रीराम कथा व्यास पीठ की श्रीमती माला राकेश सिंह, लेखराज सिंह, श्रीमती सुजाता सिंह प्रवीण वर्मा ने सपत्नी, संदीप जैन, आरती की।
*रामकथा पूरे समाज के लिए पाथेय -*
संचालन करते हुए पं. ब्रजेश दीक्षित ने कहा कि श्रीराम जनम जग मंगल हेतु के संबंध में महारजाश्री ने जो शास्त्र सम्मत व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, वह हम सबके लिए पाथेय है। महाराजश्री के वचन व्यासों के लिए उपजीय तो है ही, संपूर्ण समाज के लिए भाी पाथेय भी हैं। उन्होंने राम जनम के मंगल होने संबंधी कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उद्घाटित किया है। मानस जगत में चार तरह के वाद हैं। रस वाद बिंदुजी ने वृंदावन से चलाया। युक्तिवाद काशी के विद्वानों ने संगति वाद अयोध्या के संतों ने, और प्रतीक वाद परंपरा चलाई साकेतवासी रामकिंकर जी ने। ओर चित्रकूट से पदार्थवाद की पांचवी परंपरा चलाई। वर्तमान युग रामभद्राचार्यजी के नाम पर हैं। अभी चूंकि पदार्थ वाद चल रहा। मानस के प्रत्येक पद का क्या उपयोग हो सकता है, यह महाराज श्री की वाणी से मिलता है। महाराजश्री ने बताया है कि हमारे कंठ में भी मालकोष है, रामकथा उसका भी उदाहरण बनती है।
सादर प्रकाशनार्थ
श्रीकांत साहू
रामकथा समन्वयक