श्रीरामकथा में स्वामी रामभद्राचार्य जी ने की राम नाम की शक्ति की व्याख्या
जबलपुर। श्रीराम नाम की गंगा वह पावन सत्य धारा है, जिसमें स्नान करने से जीव का सहज ही तारण होता है। जिसने भी रामनाम की पावनी गंगा में डुबकी लगाई, उसका कल्याण हो गया। इस गंगा में डुबकी लगाने वाले ब्रम्हा-विष्णु-महेश, माता सरस्वती भी हैं। अत: बिना किसी विचार के राम नाम का अनुशरण करना चाहिए। इस आशय के उद्गार तुलसी पीठाधीश्वर, पद्म विभूषण, जगदगुरु, रामानंदाचार्य श्री रामभद्राचार जी महाराज ने अवधपुरी ग्वारीघाट में चल रही नवाह श्रीरामकथा के द्वितीय दिवस अपने मंगल प्रवचन में व्यक्त किए। समरसता सेवा संगठन के आयोजनत्व में हो रही पावन रामकथा में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष महाराज श्री ने राम नाम और उसकी महिमा की मानस और वेदांत आधारित व्याख्या की।
उन्होंने कहा कि इस जगत में कम से कम 9 अमंगल हैं, श्रीराम नाम इन सबसे पार लगाने वाली शक्ति है। उन्होंने ‘सबको तारती है राम नाम की गंगा’ भजन सुना सबको मंत्र मुग्ध कर कहा कि ब्रम्हा, विष्णु, महेश, सरस्वती, तुलसी, कबीर सबने राम नाम की गंगा में डुबकी लगाई है। त्रेता में अलग-अलग रूप में जन्म लेकर देवताओं ने रामजी की सेवा की।
*रामचिंतन से होगा हर समस्या का समधान -*
महाराजश्री ने कहा कि राम नाम के चिंतन से हर समस्या का समधान होगा। तुलसीदासजी ने विचार पक्ष और व्यवहार पक्ष दोनों के माध्यम से कहा है कि राम नाम से ही जगत का मंगल और कल्याण होता है। अत: सनातन धर्मावलंबियों को चिंता नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोस्वामी जी के पहले तक जितने संत हुए। उन्होंने दशरथ पुत्र राम और निर्गुण राम को अलग माना। परंतु गोस्वामी जी को ये स्वीकार नहीं था, और यही वेदसम्मत भी है कि जो परब्रम्ह परमात्मा है, वही दशरथ नंदन बनकर अयोध्या में प्रकट हुए हैं।
महाराजश्री ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी और हमारे नायक भगवान राम अजेय और परम पुरुषार्थ संपन्न हैं। चौपाई ‘राजीव नयन धरे धनु सायक-भगत विपति भंजन सुखदायक’ के माध्यम से उन्होंने राम नाम की सुंदर व्याख्या करते हुए कहा कि आज रामलला जी अयोध्या में विराज गए हैं। विश्व के सभी चोटी के लोग रामजी की सत्ता को आदर पूर्वक प्रणाम करते हैं।
*राममोपासना सबसे प्राचीन परंपरा -*
राम नाम की महिमा की व्याख्या करते हुए मानस मर्मज्ञ पूज्यश्री ने कहा कि हमारे आराध्य श्रीराम जी महाविष्णु हैं। उपासना परंपरा में रामोपासना सबसे प्राचीन परंपरा है। उन्होंने कहा कि राम मंत्र संसार का सबसे प्राचीन और वैदिक मंत्र है। राम मंत्र की परंपरा सबसे पुरानी परंपरा है। भागवत जी के नौवे स्कंध के 11वें अध्याय में भी रामजी का जिक्र है। पारास्कर सूत्र की चर्र्चा करते हुए उन्होंने कहा महाराजश्री ने कहा कि वेद के दो भाग है मंत्र भाग और ब्राम्हण भाग। वेद के मंत्र भाग में राम और सीता शब्द आता है, जबकि विष्णु व्यापक अर्थ में है। उन्होंने नारायण शब्द मंत्र भाग में नहीं आता ब्रम्हण भाग में आता है। पर रामजी मंत्र भाग में भी हैं। राम शब्द अखंड है, नारायण शब्द अखंड नहीं है। वह सखंड है। रामेण बन जाता है पर नारायणेय नहीं बनता।
रामचरित मानस में कई चौपाइयों के माध्यम से उन्होंने बताया कि श्रीसीता जी ही श्रीजी है। हमारे रामानुज संप्रदाय की प्रथम आचार्य श्रीजी ही हैं। उन्होंने कहा रामनाम जगत का प्रथम मंगल है। रामचरित मानस की घोषणा है सत्यसंध पालक श्रुति श्रेतू-रामजनमु जग मंगल हेतू। अन्य अवतारों का कुछ और उद्देश्य हो सकता है। गीता में कहा है भगवान साधुओं की रक्षा दुष्टों का नाश धर्म की संस्थापना के लिए आते हैं। पर श्रीराम का जो प्राकट्य है, वह संपूर्ण जगत के मंगल के लिए हुआ है।
*श्रीसीता जी ही राम, श्रीरामजी ही श्रीसीता*
महारजश्री ने सीताराम कीर्तन को लेकर कहा कि दो नाम हैं, पर हैं दोनों एक। अर्थव वेद की श्रुति के माध्यम से उन्होंने बताया कि रामजी ही सीताजी हैं, और सीताजी ही रामजी हैं। इस कारण मैं ‘सीताराम जय सीताराम’ स्तुति गाता हूं। एक ही परमात्मा ने हमको आनंद देने के लिए दो रूप धारण किया हैं। वही परमात्मा मिथिला में सीताजी बन कर हमारी माताजी बन गया और वही राम अयोध्या में जन्म लेकर हमारा पिता बन गया।
उन्होंने कहा कि संस्कारधानी वासी जान लें कि वेद के हजारों मंत्रों में श्रीराम का यशोगान किया गया है। सीता ही राम और राम ही सीता हैं, इसे महाराजश्री ने अनेक उद्हरणों के माध्यम से सिद्ध भी किया। यही कारण है कि सनातन से सीता राम जय सीताराम स्तुति गाई जा रही है। तुम्ही हो माताश्च पिता त्वमेव वस्तुत: सीताराम जी की ही वंदना है। रामजी ही ब्रम्ह हैं, सीताजी भी ब्रम्ह हैं। लीला में सीता जी कार्य ब्रम्ह की भूमिका में हैं जबकि रामजी कारण ब्रम्ह की भूमिका निभा रहे हैं। वे दिखते भिन्न हैं, पर हैं अभिन्न।
108 मणकों का जाप सीताराम की पूर्णता-
महाराज श्री ने कहा कि हम 108 गुरियों की ही माला जपते हैं। ये सीताराम शब्द की पूर्णता का ही प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि वर्णमाला में चारों अक्षर जिन जिन अंक में आए हैं, उनका आपसी जोड़ 108 ही होता है। उन्होंने बताया कि सीता नाम 54 और राम नाम का जोड़ 54 है। दोनों को मिलाकर 108 होता है। वस्तुत: 108 की माला का जाप सीताराम की ही पूर्णता है। सबसे सुंदर, सबसे प्राचीन और सबसे मर्यादित रामोपसाना है। विषय चौपाई राम जनम जग मंगल हेतु को भी उन्होंने इस जोड़ से रेखांकित किया। श्रीराम जी का जन्म तीनों लोकों के मंगल विधान के लिए हुआ है। भू लोक में मनुष्य रहते हैं, भुवर लोग में पक्षी रहते हैं और नीचे नाग आदि रहते हैं। रामजी तीनों लोकों के लोगों का मंगल करते हैं। कादंबरी के मंगलारण के माध्यम से उन्होंन बताया कि हमारे मुख्य त्रिदेव का मंगल भी प्रभु श्रीरामजी ही करते हैं। रावण ने हमारे त्रिदेव का मंगल छीन लिया था। रामजी ने रावण का नाश का त्रिदेव का मंगल किया। क्योंकि श्रीराम का बाण ही रावण की भुजाओं को काट सकता है।
आत्मा को पवित्र कर रही कथा: रामचंद्र दासजी
तुलसी पीठ के रामचंद्रदास शास्त्री ने गिरदावली के पूर्व कहा कि यहां हो रही कथा भक्तों के तन-मन, चित्त-चेतना और आत्मा को निर्मल कर रही है। ऐसा नर्मदा तट जहां हमारे मनीषियों ने जीवन का सार अर्जित किया, वहां महारजश्री की श्रीरामकथा होना बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जहां महाराजश्री जैसे मनीषी होते हैं, वहां प्रभु की नाम निष्ठा प्राप्त होना सहज हो जाता है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि जिस मार्ग पर संत चलें हमें उसी मार्ग पर चलना चाहिए।
उन्होंने बताया कि महाराजश्री का जीवन दिव्यांग बच्चों के कल्याण के लिए समर्पित रहा है। जिनका कोई नहीं था, उन्हें महाराज श्री ने अपनी शरण में लिया और उन्हें शिक्षा-विद्या दी। उन्होंने दुनिया का पहला दिव्यांग विश्व विद्यालय बनाया, जिसका सूत्र दिया मानवता है मेरा मंदिर मैं हूं उसका पुजारी। महाराजश्री पहली से पीएचडी तक दिव्यांगों को नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। जो बच्चे कभी किसी के सहारे की उम्मीद रखते थे, वे आज अपने परिवार के सहारा बने हुए हैं। महाराजश्री हजारों बच्चों को स्वाबलंबी बनाने का कार्य कर रहे हैं। यह समाज के सहयोग से ही संभव हो सका।
*मंत्री राकेश सिंह ने किया पादुका पूजन -*
महाराजश्री के व्यास पीठ पर आसीन होने के बाद प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री राकेश सिंह, मुख्य यजमान डॉ. प्रकाश धीरावाणी, सुदर्शन जगदीश चोहटेल, डॉ अमीरचंद सोनकर, डॉ जितेन्द्र जामदार, समरसता सेवा संगठन अध्यक्ष संदीप जैन दीपक महरौलिया , गुलशन माखीजा, लोकराम कोरी , वीरेन्द्र केसरवानी, दास प्रसाद अहिरवार , प्रदीप चौहान द्वारा पादुका पूजन किया गया।
चित्रकूट पीठ के रामचंद्रदास महाराज ने पादुका पूजन का विधान संपन्न कराया। पूजन के बाद सभी आमंत्रितों ने व्यासपीठ का पूजन कर महाराजश्री का स्वागत-वंदन किया।
*महाराजश्री के श्रीमुख से राम कथा होना हम सबका सौभाग्य – श्री राकेश सिंह*
इस अवसर पर मंत्री श्री राकेश सिंह ने महाराजश्री का स्वागत करते हुए कहा कि महाराजश्री की यहां कथा का वाचन होना शहर का सौभाग्य है। उनहोंने कहा कि प्रभु श्रीराम का नाम ही जीवन को तारने के लिए पर्याप्त है। और जब महाराज श्री उनका नाम लेते हैं तो वो स्थान और पवित्र हो जाता है। उन्होंने महाराज श्री से आग्रह किया कि उनका सानिध्य आने वाले वर्षों में भी प्राप्त होता रहे, और शहर से यदि कोई त्रुटि हुई हो, तो उसे क्षमा करेंगे।
महाराजश्री का स्वागत राघवदेवाचार्य, कालिकानंद जी ने भी स्वागत किया। संचालन करते हुए ब्रजेश दीक्षित ने व्यास पीठ पर आसीन कथाव्यास महाराजश्री के जीवनवृत्त पर प्रकाश डाला।
*नमो राघवाय की संगीत मय प्रस्तुति -*
महाराजश्री के आगमन पर नमो राघवाय..नमो राघवाय..मेरे गुरुवर सरकार प्यारे जगत गुरु सरकार-ऊंची है महिमा पावन है द्वार की प्रस्तुति सबके कानों में शहर घोल गई। बड़े भाव से सिया-रघुनाथजी के नैनन के तारे-रामचंद्रदास जी के प्राणों से प्यारे। करो दंडवत स्वीकार सुनो सबकी पुकार ऊंची है महिमा पावन है द्वार की प्रस्तुति ने माहौल भावपूर्ण कर लिया। महाराज श्री के व्यास पीठ पर आसीन होने पर नगर पंडित सभा के विद्वान रोहित तिवारी सहित अन्य आचार्यों ने स्वस्ति वाचन का माहौल धर्ममय कर दिया। महाराजश्री के व्यास पीठानस्थ होने पर संस्कारधानी के श्रद्धालुओं ने खड़े होकर महाराजश्री का स्वागत कर अपने संस्कारों का परिचय दिया।
*दुर्गावती रानी महारानी है हमारी -*
कथा पूर्व वीरांगना रानी दुर्गावती के जीवन पर आधारित नाटिका का भावपूर्ण विवेचन किया गया। नाट्य लोग संस्था की प्रस्तुति में नर्रई नाला, मदन महल का भी वर्णन था। बुंदेली लोकशैली के गायन भरी प्रस्तुतिने सबका मन मोह लिया। आसपास के स्थलों की चर्चा से रानी का जीवन दर्शकों के मन मष्तिष्क में सजीव हो उठा। मदन सिंह बने पात्र ने कहा कि यदि नर्रई नाला के पास बना जलाशय फोड़ दिया जाए तो रानी पहाड़ क्रास नहीं कर सकेगी। रानी के मदन महल किले में रात रुकने की जानकारी तब के जयचंदों ने रानी के दुश्मनों को दी थी।
मंच पर प्रदर्शित भावपूर्ण अभियन, स्पेशल साउंड इफैक्ट, सुंदर ड्रेस डिजाइनिंग, आकर्षक युद्ध कौशल ने तब के युग को साकार कर दिया। रानी के स्वयं को कटार भौंक लेने वाला दृष्य बहुत भावुक करने वाला था। पार्श्व में बजा गीत अमर हो गई रे..गढ़ मंडला की रानी दुर्गा अमर हो गई रे भावपूर्ण था। केशरिया ध्वज लहराते नाटिका के कलाकार खूब फबे।
माननीय न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल, जज रामनरेश पटेल, डॉ कैलाश गुप्ता, गिरिराज चाचा, मेवालाल छिरोलिया, जगजीत सिंह पप्पू सहित भक्त जनो ने जगदगुरु का आशीर्वाद लेते हुए कथा श्रवण की।