जबलपुर के खेतों में बिखरेगी तिल की खुशबू.ग्रीष्म सीजन में किसानों ने की 366 हेक्टेयर में बोनी.


जबलपुर – जिले के कृषि परिदृश्य में इस वर्ष एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार की कृषक हितैषी नीतियों और फसल विविधीकरण अभियान से प्रेरित होकर जबलपुर के किसानों ने इस बार ग्रीष्मकालीन (जायद) सीजन में तिल की खेती की ओर विशेष रुचि दिखाई है।

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जहाँ बीते वर्ष जायद सीजन में जिले में तिल का रकबा शून्य था, वहीं इस वर्ष किसानों ने 366 हेक्टेयर क्षेत्र में तिल की बोनी कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

शून्य से 366 हेक्टेयर तक का सफर :-

पिछले कुछ वर्षों तक ग्रीष्मकाल में किसान मुख्य रूप से मूंग या उड़द पर निर्भर थे। लेकिन प्रशासन और कृषि विशेषज्ञों द्वारा चलाये गये जागरूकता अभियान का असर धरातल पर दिखाई देने लगा है।सिंचाई की उपलब्धता एवं कम लागत में अधिक मुनाफे की संभावना को देखते हुए, इस बार किसानों ने तिल को प्राथमिकता दी है।

तिल की खेती ही क्यों :-

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीष्मकालीन तिल की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। तिल की फसल को बहुत कम सिंचाई की जरूरत होती है, जो गर्मी के मौसम के लिए सबसे उपयुक्त है। इसमें खाद और कीटनाशकों का खर्च अन्य फसलों की तुलना में कम आता है, जबकि बाजार में तिल के भाव (खासकर सफेद तिल) काफी ऊंचे रहते हैं।

मृदा स्वास्थ्य में सुधार :-

तिल की खेती से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, जिससे अगली खरीफ फसल की पैदावार भी बेहतर होती है। उन्होंने बताया कि अन्य फसलों के मुकाबले तिल में कीट और रोगों का खतरा कम रहता है।

कॄषि अधिकारियों के अनुसार तिल की वैश्विक मांग और इसके औषधीय गुणों के कारण किसानों को इसका उचित मूल्य मिलना तय है। जिले में 366 हेक्टेयर में हुई तिल की बोनी इस बात का संकेत है कि जबलपुर का किसान अब प्रयोगधर्मी हो रहा है और बाजार की मांग के अनुरूप खेती करने के लिए तैयार है।उप संचालक कृषि यू के कटहरे ने तिल की खेती की ओर जिले के किसानों के झुकाव को जिले की कृषि अर्थ व्यवस्था के लिये शुभ संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि फसल चक्र में बदलाव लाकर किसान न केवल अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन भी बना सकते हैं।