भागलपुर। देश की चुनावी राजनीति में अपनी अनोखी पहचान बनाने वाले बिहार के भागलपुर निवासी नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरतीपकड़’ का निधन हो गया। उन्होंने 96 वर्ष की उम्र में पटना में अंतिम सांस ली। चुनावी मैदान में लगातार उतरने और कभी चुनाव नहीं जीतने के बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें देशभर में अलग पहचान दिलाई। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अपने जीवन में करीब 281 चुनाव लड़े।
राष्ट्रपति चुनाव तक आजमाई किस्मत
नागरमल बाजोरिया का चुनावी सफर स्थानीय चुनावों से शुरू होकर लोकसभा और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचा। वर्ष 1969 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. गिरि के खिलाफ नामांकन दाखिल कर सुर्खियां बटोरी थीं। बाद के वर्षों में उन्होंने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए भी कई बार नामांकन किया।
उनकी खासियत यह थी कि वे चुनाव को केवल जीत-हार के नजरिए से नहीं देखते थे। उनका चर्चित कथन था— “मैं चुनाव नहीं हारता, जनता हमेशा हारती है।” उनके अनुसार चुनाव लोकतंत्र में आम नागरिकों को जागरूक करने और महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाने का माध्यम था।
इंदिरा गांधी और वाजपेयी जैसे दिग्गजों को दी चुनौती
‘धरतीपकड़’ ने अपने लंबे चुनावी जीवन में देश के कई बड़े राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा। इनमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं। इसके बावजूद वे किसी चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सके।चुनाव लड़ने की उनकी अनोखी शैली भी लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती थी। यही लगातार चुनावी सक्रियता उन्हें ‘धरतीपकड़’ नाम से मशहूर करने वाली प्रमुख वजह बनी।
चुनावी मैदान से समाजसेवा तक
नागरमल बाजोरिया की पहचान केवल चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं थी। जीवन के बाद के दौर में उन्होंने समाजसेवा को विशेष महत्व दिया। गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में सहयोग, दहेज-मुक्त विवाह को प्रोत्साहन, जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और पेयजल की सुविधा के लिए ट्यूबवेल लगवाने जैसे कार्यों से भी वे जुड़े रहे।करीबियों के अनुसार, अस्वस्थता के कारण लगभग 2014 के बाद उन्होंने सक्रिय रूप से चुनाव लड़ना कम कर दिया और अपना अधिक समय जरूरतमंदों की मदद में लगाने लगे।
भागलपुर ने खोया अनोखा व्यक्तित्व
अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मे नागरमल बाजोरिया बाद में भागलपुर आकर बसे और यहीं अपना व्यवसाय स्थापित किया। दशकों तक चुनावी प्रक्रिया में लगातार भागीदारी और सामाजिक सरोकारों के कारण वे भागलपुर की एक विशिष्ट पहचान बन गए थे। उनके निधन से शहर ने ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसकी पहचान चुनावी जीत से नहीं बल्कि लोकतंत्र में लगातार भागीदारी, व्यवस्था पर सवाल उठाने के साहस और समाजसेवा से बनी।नागरमल बाजोरिया का जीवन इस मायने में भी अनोखा रहा कि जहां अधिकांश लोग चुनाव को सत्ता तक पहुंचने का रास्ता मानते हैं, वहीं उन्होंने इसे जनजागरण और लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम बनाया।