बरगी जलाशय में घटते मत्स्य उत्पादन, से संकट में मछुआरे

जबलपुर। बरगी जलाशय में लगातार घटते मत्स्य उत्पादन के कारण हजारों पारंपरिक मछुआरा परिवार गंभीर आजीविका संकट का सामना कर रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि बड़ी संख्या में मछुआरे अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बरगी जलाशय छोड़कर बाणसागर, राजगढ़, माचागोरा तथा अन्य जलाशयों में मत्स्याखेट हेतु पलायन करने को मजबूर हैं। इन जलाशयों में बाहरी मछुआरों के रूप में कार्य करने के दौरान उन्हें स्थानीय ठेकेदारों और व्यापारियों द्वारा कम मजदूरी, अनुचित भुगतान तथा अन्य आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ता है। बरगी जलाशय में मत्स्य उत्पादन में लगातार हो रही गिरावट को लेकर मछुआरों की प्राथमिक सहकारी समितियां लंबे समय से राज्य सरकार से वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र अध्ययन कराने की मांग करती रही हैं। मछुआरों का कहना है कि जलाशय की पारिस्थितिकी, जल स्तर में उतार-चढ़ाव, मत्स्य प्रजातियों की स्थिति तथा मत्स्य प्रबंधन व्यवस्था का समग्र वैज्ञानिक मूल्यांकन किए बिना उत्पादन में गिरावट के वास्तविक कारणों का पता नहीं लगाया जा सकता।
मछुआरों का यह भी आरोप है कि जलाशय में मत्स्य बीज संचय (फिश सीड स्टॉकिंग) की वर्तमान व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। मत्स्य बीज की गुणवत्ता, मात्रा, प्रजातियों के चयन तथा समयबद्ध संचय की स्वतंत्र निगरानी नहीं होने के कारण इसका प्रतिकूल प्रभाव मत्स्य उत्पादन पर पड़ रहा है। यदि वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज का नियमित और पारदर्शी संचय सुनिश्चित किया जाए, तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
उल्लेखनीय है कि लगभग 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले बरगी जलाशय पर मंडला, सिवनी और जबलपुर जिलों की 54 प्राथमिक मछुआरा सहकारी समितियों के लगभग 3,000 मछुआरा परिवार अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं। मत्स्य उत्पादन में गिरावट का सीधा प्रभाव इन परिवारों की आय, रोजगार और सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ ने कहा कि 1990 के दशक में तत्कालीन राज्य सरकार ने राज्य मत्स्य विकास निगम को समाप्त कर मध्यप्रदेश राज्य मत्स्य महासंघ, भोपाल के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र के संचालन की व्यवस्था की थी। इसका उद्देश्य जलाशयों के विकास, मत्स्य उत्पादन और मछुआरा कल्याण से जुड़े निर्णयों में स्थानीय सक्रिय मछुआरा प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करना था। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले दो दशकों से अधिक समय से राज्य मत्स्य महासंघ के चुनाव नहीं कराए गए हैं और पूरा संचालन केवल राज्य शासन द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से किया जा रहा है। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी और सहकारिता की मूल भावना प्रभावित हुई है।
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि बरगी जलाशय में घटते मत्स्य उत्पादन के कारणों का स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए। मत्स्य बीज संचय की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, वैज्ञानिक एवं जनभागीदारी आधारित बनाया जाए। मछुआरों को मछली पकड़ने की मजदूरी वर्तमान महंगाई और श्रम लागत के अनुरूप बढ़ाई जाए। मध्यप्रदेश राज्य मत्स्य महासंघ के लंबित चुनाव तत्काल कराकर मछुआरा प्रतिनिधियों को लोकतांत्रिक भागीदारी का अधिकार दिया जाए।
संघ ने राज्य सरकार से कहा है कि यदि इन मांगों पर शीघ्र सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो प्रदेश के हजारों पारंपरिक मछुआरा परिवारों का आजीविका संकट और गहरा जाएगा तथा उन्हें अपने ही जलाशयों से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।