हेमोडायलिसिस: जीवन का अंत नहीं, जीने का एक और मौका है:डॉ. विशाल रामटेके

सिवनी – क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या है। इसके प्रमुख कारणों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और बढ़ती उम्र शामिल हैं। किडनी की बीमारी अक्सर धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआत में इसके लक्षण आसानी से दिखाई नहीं देते। जब किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो जाती है, तब शरीर में सूजन, सांस लेने में परेशानी, लगातार जी मिचलाना, थकान, भूख कम लगना या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। डॉ. विशाल रामटेके, एसोसिएट डायरेक्टर – नेफ्रोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नागपुर ने इसके बारे में जानकारी दी ।
जब किडनी शरीर से हानिकारक पदार्थ और अतिरिक्त पानी बाहर निकालने या शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में सक्षम नहीं रहती, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे समय में हेमोडायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। डायलिसिस शुरू करने का फैसला केवल ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर नहीं किया जाता। मरीज के लक्षण, होने वाली जटिलताएं और उसकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को भी ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया जाता है।
हेमोडायलिसिस में एक डायलिसिस मशीन और डायलाइजर नामक विशेष फिल्टर का इस्तेमाल किया जाता है। यह फिल्टर खून से हानिकारक पदार्थ और अतिरिक्त पानी निकालने में मदद करता है और शरीर में रासायनिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। इसके लिए खून को शरीर में बनाई गई एक विशेष रक्त वाहिका के जरिए मशीन तक पहुंचाया जाता है। इसे आमतौर पर आर्टेरियोवेनस फिस्टुला (एवी फिस्टुला) कहते है। डायलिसिस का एक सेशन आमतौर पर लगभग 4 घंटे चलता है। कई मरीजों को सप्ताह में 3 बार डायलिसिस करवाना पड़ता है।
“डॉक्टर, क्या इसका मतलब है कि मेरे पास अब जीने के लिए सिर्फ कुछ ही दिन बचे हैं?” यह सवाल 52 वर्षीय एक मरीज ने पूछा था। वह स्कूल टीचर थे और उन्हें किडनी फेल होने की गंभीर बीमारी का पता चला था। कई मरीजों की तरह उन्हें भी लगता था कि डायलिसिस शुरू होने का मतलब है कि अब उनका सामान्य और अच्छा जीवन खत्म हो जाएगा।
लेकिन छह महीने बाद वह फिर से स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। वह नियमित रूप से डायलिसिस करवा रहे थे, परिवार के साथ समय बिता रहे थे और अपनी बेटी के ग्रेजुएशन समारोह का इंतजार कर रहे थे। उनकी कहानी यह बताती है कि हेमोडायलिसिस हार या जिंदगी का अंत नहीं है, बल्कि ज़िंदगी बचाने वाला इलाज है।
डायलिसिस को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि डायलिसिस शुरू होने के बाद मरीज सामान्य और सक्रिय जीवन नहीं जी सकता। जबकि नियमित डायलिसिस कराने वाले कई लोग नौकरी करते हैं, यात्रा करते हैं, परिवार के साथ समय बिताते हैं और अपनी पसंद की गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। हालांकि डायलिसिस किडनी फेल होने की समस्या को ठीक नहीं करता, लेकिन जब किडनी अपना काम ठीक से नहीं कर पाती, तब यह शरीर को जरूरी सहारा देता है।
डायलिसिस के साथ बेहतर जीवन जीने के लिए मरीज की सक्रिय भागीदारी भी बहुत जरूरी है। मरीज को डॉक्टर की सलाह के अनुसार खान-पान और तरल पदार्थों की मात्रा का ध्यान रखना, बताई गई दवाएं नियमित रूप से लेना, डायलिसिस के सभी सत्रों में नियमित रूप से जाना और अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए। इसके अलावा, जिस जगह से डायलिसिस के लिए खून लिया जाता है, उसे चोट और संक्रमण से बचाना भी बहुत जरूरी है।सही मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट लंबे समय तक डायलिसिस का एक विकल्प हो सकता है। हालांकि, हर मरीज को सही डोनर नहीं मिल पाता और हर मरीज ट्रांसप्लांट के लिए मेडिकल रूप से फिट भी नहीं होता। ऐसे मरीजों के लिए डायलिसिस लंबे समय तक जीवन बचाने वाला इलाज हो सकता है। वहीं, कुछ मरीजों के लिए डायलिसिस तब तक मदद करता है, जब तक उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सही डोनर नहीं मिल जाता।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि उन्हें किडनी की बीमारी है और बीमारी बढ़ते-बढ़ते किडनी फेल होने की स्थिति तक पहुंच जाती है। नियमित स्वास्थ्य जांच, खासकर डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों के लिए, बहुत जरूरी है। समय पर किडनी विशेषज्ञ (नेफ्रोलॉजिस्ट) से सलाह लेने से किडनी की बीमारी का जल्दी पता लगाया जा सकता है और इसके बढ़ने की गति को कम किया जा सकता है।
हेमोडायलिसिस जिंदगी का अंत नहीं है। सही इलाज, परिवार का सहयोग और डॉक्टरों के सहयोग तथा जीवनशैली में जरूरी बदलावों के साथ किडनी फेलियर से जूझ रहे लोग काम जारी रख सकते हैं, आत्मनिर्भर रह सकते हैं और एक बेहतर एवं सार्थक जीवन जी सकते हैं।