छिंदगांव बना बाँस हस्तशिल्प प्रशिक्षण का उभरता केंद्र

छिंदगांव -:  छिंदगांव, जिला हरदा स्थित  बांसकारी टेकनोंलोजी और कोमन फेसिलिटी सेंटर में 15 दिवसीय बाँस शिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण में हरदा, रेहटगांव, छिंदगांव एवं टिमरनी क्षेत्र के 80 प्रतिभागी प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।
यह केंद्र सर्च एंड रिसर्च डेवलोपमेंट सोसाइटी द्वारा डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सहयोग स्थापित किया गया है । पिछले ढाई वर्षों में इस केंद्र के माध्यम से 800 से अधिक लोगों को प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाया गया है।
बाँस जब कारीगरों के हाथों में आता है तो वह केवल एक वन उपज नहीं रहता, वह आकार लेता है—रचनात्मकता का, आत्मनिर्भरता का और सपनों का। इन्हीं सपनों को साकार करने की दिशा में यह प्रशिक्षण कार्यक्रम एक सशक्त पहल है।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को आकर्षक लैम्पशेड, बाँस के प्लांटर, मल्टीपरपज़ बॉक्स तथा अन्य उपयोगी सजावटी वस्तुएँ बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रशिक्षण का संचालन त्रिपुरा  से आए विशेषज्ञ प्रशिक्षक जतन शर्मा एवं श्रीमति लिपि द्वारा किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम की विशेषता पारंपरिक कला के साथ तकनीक का समन्वय है। केंद्र में उपलब्ध आधुनिक मशीनों से कारीगरों का श्रम कम हुआ है और उत्पादों की फिनिशिंग बेहतर हुई है। साथ ही वैज्ञानिक तरीके से बाँस का ट्रीटमेंट कर उसकी आयु बढ़ाई जा रही है, जिससे उत्पाद अधिक टिकाऊ और बाजार योग्य बन रहे हैं। अब हर उत्पाद में सिर्फ हस्तकला ही नहीं, बल्कि तकनीक की सटीकता और गुणवत्ता का भी समावेश दिखाई देता है।
डॉ. मोनिका जैन ने कहा कि जब कला के साथ तकनीक जुड़ती है तो यह हस्तशिल्प के लिए हानिकारक नहीं बल्कि सहायक सिद्ध होती है। तकनीकी हस्तक्षेप से श्रम की कठिनाई कम होती है, उत्पाद की गुणवत्ता और फिनिशिंग बेहतर होती है तथा उत्पादकता बढ़ने से कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है।
अर्पित बछोतिया ने बताया कि प्रशिक्षित कारीगरों द्वारा निर्मित उत्पादों को भोपाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वन मेला एवं लोकरंग महोत्सव में प्रदर्शित किया गया, जहाँ उन्हें उत्कृष्ट प्रतिसाद प्राप्त हुआ तथा कारीगरों को अच्छे ऑर्डर भी मिले।
यह पहल केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि परंपरा और प्रौद्योगिकी के संगम से आत्मनिर्भरता की एक नई कहानी लिख रही है। बाँस की हर बुनावट में अब रोजगार की उम्मीद, सम्मान की अनुभूति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का संकल्प झलकता है।