आदिवासी महिला बुनकरों को संथाली बुनाई से नई पहचान मिलेगी


जबलपुर| रामराज कॉटन ने पंचा टीएम नाम से एक नई हैंडलूम ओडिशा के मयूरभंज की पारंपरिक संथाली बुनाई को आधुनिक धोती के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पंचा के माध्यम से भारत की कम-ज्ञात बुनाई परंपराओं को पहचान दिलाने के अपने प्रयास को आगे बढ़ा रहा है, जिससे इस शिल्प को जीवित रखने वाली आदिवासी महिला बुनकरों को नई पहचान और आजीविका के अवसर मिल सकें।
संथाली आदिवासी समुदाय की महिलाएँ परंपरागत रूप से इस विशिष्ट बुनाई से साड़ियाँ बनाती रही हैं, लेकिन संरक्षण में कमी, बदलती जीवनशैली और बाजार के सीमित अवसरों के कारण पिछले कई दशकों में यह बुनाई धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती गई। इसकी कलात्मक विशेषता और आज के समय में इसकी उपयोगिता को महत्व देते हुए, रामराज कॉटन के संस्थापक एवं अध्यक्ष के. आर. नागराजन ने अब पंचा के माध्यम से संथाली बुनाई को धोती के रूप में नया स्वरूप दिया है।