पराली प्रबंधन के सख्त नियमों पर पुनर्विचार करे सरकार, छोटे किसानों के पास नहीं हैं पर्याप्त संसाधन : भारत कृषक समाज

मुख्यमंत्री को खुला पत्र लिखकर किसानों ने मांगी राहत, बरगी क्षेत्र में जुर्माने की कार्रवाई पर जताया विरोध, आदेश वापस लेने की मांग

जबलपुर। पराली जलाने पर रोक और इसके उल्लंघन पर की जा रही दंडात्मक कार्रवाई को लेकर किसानों ने प्रदेश सरकार से नियमों पर पुनर्विचार करने की मांग की है। भारत कृषक समाज ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को खुला पत्र लिखकर कहा है कि किसान पराली जलाने के दुष्परिणामों से परिचित हैं और वे भी इसे जलाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन पराली के निस्तारण के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी और खेती की सीमित समय-सीमा के कारण उनके सामने गंभीर व्यावहारिक समस्याएं हैं। संगठन ने मांग की है कि जब तक छोटे और सीमांत किसानों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते, तब तक उनके खिलाफ एफआईआर और अर्थदंड जैसी सख्त कार्रवाई नहीं की जाए।

भारत कृषक समाज के पदाधिकारियों ने पत्र में बताया कि जबलपुर जिले में 85 प्रतिशत से अधिक किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं, जिनके पास पांच एकड़ से कम कृषि भूमि है। सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, रीपर, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) और बेलर मशीन जैसे उपकरण महंगे होने के कारण आम किसानों की पहुंच से बाहर हैं। ये संसाधन सीमित संख्या में उपलब्ध हैं और उनका लाभ भी कुछ सक्षम किसान या एजेंसियां ही उठा पा रही हैं।

पत्र में बताया गया कि जबलपुर जिले में लगभग एक लाख 76 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है, जबकि पराली एकत्रित करने के लिए बेलर मशीनों की संख्या बेहद कम है। ऐसे में उपलब्ध मशीनों से पूरे जिले की पराली का समय पर निस्तारण करना संभव नहीं है। किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खरीफ की फसल कटने के बाद रबी की बोवनी की है। फसल कटाई के बाद खेत तैयार कर अगली फसल की बोवनी के लिए किसानों के पास महज एक सप्ताह का समय रहता है।

किसानों का कहना है कि बेलर मशीन उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों की भी अपनी शर्तें हैं। वे एक साथ कम से कम 40 एकड़ क्षेत्र की मांग करती हैं और मशीन उपलब्ध कराने में 10 से 15 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है। इसके अलावा खेतों तक बड़ी मशीनों के पहुंचने के लिए पर्याप्त रास्ते नहीं हैं। नहरों के किनारे के रास्ते खराब होने और आसपास के खेतों में कटाई पूरी नहीं होने के कारण मशीनों की आवाजाही में भी परेशानी आती है।

पत्र में हार्वेस्टर से कटाई के दौरान एसएमएस सिस्टम नहीं लगाए जाने की समस्या भी उठाई गई है। किसानों के अनुसार यह सिस्टम महंगा पड़ता है और इससे कटाई में अतिरिक्त समय व डीजल खर्च होता है। इसका आर्थिक बोझ भी किसानों को ही उठाना पड़ता है। इन परिस्थितियों में समय पर अगली फसल की बोवनी सुनिश्चित करना किसानों के लिए चुनौती बन जाता है।

भारत कृषक समाज ने बरगी क्षेत्र के किसानों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 223 के तहत की गई अर्थदंड की कार्रवाई पर भी कड़ा विरोध जताया है। संगठन का कहना है कि पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए बिना किसानों के खिलाफ एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है। पत्र में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का हवाला देते हुए किसानों को पराली प्रबंधन के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने और नुकसान की प्रतिपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग भी की गई है।

संगठन ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि एसएमएस के बिना हार्वेस्टर से कटाई पर रोक लगाने, एफआईआर दर्ज करने और अर्थदंड लगाने जैसे आदेशों पर पुनर्विचार कर उन्हें वापस लिया जाए। जब तक पराली निस्तारण के पर्याप्त साधन आम किसानों की पहुंच में नहीं आते, तब तक दंडात्मक कार्रवाई से राहत दी जाए।

किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि सख्त आदेशों के कारण किसानों में असमंजस और नाराजगी बढ़ रही है। उन्हें अपनी समस्याएं शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के लिए धरना-प्रदर्शन और आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होना पड़ रहा है। संगठन ने सरकार से किसानों की व्यावहारिक समस्याओं को समझकर शीघ्र राहत देने की अपील की है।

यह खुला पत्र भारत कृषक समाज के महाकौशल प्रदेश अध्यक्ष इंजीनियर केके अग्रवाल, महाकौशल जोन महासचिव रूपेंद्र पटेल, जिला अध्यक्ष जेआर गायकवाड़, जिला उपाध्यक्ष सुभाष चंद्रा सहित जिला कार्यकारिणी, तहसील अध्यक्षों और पदाधिकारियों की ओर से जारी किया गया है। पत्र की प्रतिलिपि प्रदेश के मंत्री, सांसद, विधायक, जनप्रतिनिधियों, मुख्य सचिव, संभागायुक्त और कलेक्टर को भी भेजी गई है।