भाजपा विधायक संजय पाठक की अवमानना मामले में सुनवाई पूरी, जस्टिस को कॉल करने के मामले में 45 मिनट चली बहस , फैसला सुरक्षित


जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जस्टिस से संपर्क करने के प्रयास से जुड़े आपराधिक अवमानना (क्रिमिनल कंटेम्प्ट) प्रकरण में कटनी के भाजपा विधायक संजय पाठक के खिलाफ चल रही सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ में करीब 45 मिनट तक दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनी गईं। अब इस बहुचर्चित मामले में जल्द फैसला आने की उम्मीद है।

जस्टिस विशाल मिश्रा को कॉल का मामला……..

मामला 30 अगस्त 2025 की उस घटना से जुड़ा है, जिसमें जस्टिस विशाल मिश्रा को फोन कर संपर्क करने का प्रयास किए जाने का आरोप है। इसके बाद 1 सितंबर 2025 की सुनवाई में जस्टिस मिश्रा ने खुले न्यायालय में इस घटना का उल्लेख करते हुए संजय पाठक और उनके परिवार से जुड़ी खदानों के मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
बाद में 2 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे आपराधिक अवमानना का मामला मानते हुए संजय पाठक के खिलाफ नोटिस जारी किया था। इससे पहले विधायक 21 अप्रैल और 14 मई को भी व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश हो चुके हैं।

कोर्ट का सवाल: नंबर सेव नहीं था तो कॉल कैसे हुई?…….

सुनवाई के दौरान विधायक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा। उन्होंने स्वीकार किया कि संजय पाठक की ओर से कॉल किया गया था, लेकिन दावा किया कि घंटी जाते ही कॉल काट दिया गया और बाद में जस्टिस मिश्रा को संदेश भी भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक अनजाने में हुई गलती थी, जिसके लिए विधायक पहले ही बिना शर्त माफी मांग चुके हैं।
इस पर एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रुसिया ने महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि मोबाइल में नंबर सेव नहीं था, तो कॉल डायल कैसे हुई? क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि संबंधित नंबर पहले से फोन में सेव था? इस पर रोहतगी ने कहा कि किसी का भी नंबर मोबाइल में सेव हो सकता है और केवल इससे गलत मंशा साबित नहीं होती।
विधायक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे, अधिवक्ता संपूर्ण तिवारी और शमिला इरम फातिमा ने भी पक्ष रखा।

शिकायतकर्ता पक्ष ने सीडीआर की मांग की………

शिकायतकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने दलील दी कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का कोई भी प्रयास आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है। उन्होंने कहा कि जस्टिस विशाल मिश्रा ने अपने न्यायिक आदेश में स्पष्ट उल्लेख किया है कि विधायक ने मामले के संबंध में उनसे संपर्क करने की कोशिश की थी, जबकि बचाव पक्ष इसे गलती से लगा कॉल बता रहा है। कामत ने अदालत से कहा कि 30 अगस्त की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) मंगाए जाने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह केवल मिस्ड कॉल थी या कॉल कनेक्ट भी हुई थी।

फैसला सुरक्षित………

दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आदेश सुरक्षित रख लिया। अब इस बहुचर्चित अवमानना प्रकरण में अदालत के फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं।