अब स्मार्ट हथियार से जबलपुर लड़ेगा कैंसर से लड़ाई

*जबलपुर।* मेडिकल साइंस में एक मशीन पूरे इलाके की तकदीर बदल दे, ऐसा कम होता है। जबलपुर में ठीक वैसा ही होने जा रहा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) में 25 साल से चली आ रही कोबाल्ट मशीनों की विदाई तय हो गई है। उनकी जगह अब वो तकनीक ले रही है जिसे दुनिया कैंसर के खिलाफ ‘स्मार्ट हथियार’ कहती है: लीनियर एक्सीलेटर।
यह बदलाव सिर्फ एक मशीन का नहीं है। यह महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के 13 जिलों के उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद है जो अब तक इलाज के लिए ट्रेनों में रातें काटते थे। भोपाल, इंदौर, दिल्ली, मुंबई की भीड़भाड़ में बेड ढूंढते थे। अब लड़ाई घर से लड़ी जाएगी।
*आखिर 25 साल क्यों लग गए?*
1999 के आसपास जब देश के बड़े कैंसर सेंटर लीनियर एक्सीलेटर की तरफ शिफ्ट हो रहे थे, जबलपुर SCI कोबाल्ट-60 मशीनों पर टिका रहा। कोबाल्ट तकनीक अपने समय में क्रांतिकारी थी, पर उसकी सीमाएं साफ थीं। रेडिएशन की बीम कम सटीक होती है। ट्यूमर के साथ आसपास के स्वस्थ अंग भी चपेट में आ जाते हैं। साइड इफेक्ट ज्यादा, रिकवरी धीमी।
डॉक्टर बताते हैं कि ब्रेस्ट, प्रोस्टेट, ब्रेन और हेड-नेक कैंसर जैसे मामलों में जहां मिलीमीटर का फर्क जिंदगी-मौत तय करता है, वहां कोबाल्ट अब ‘आउटडेटेड’ मानी जाती है। मरीजों का दर्द यही था कि जबलपुर में इलाज तो था, पर ‘सबसे अच्छा’ इलाज नहीं था। गंभीर केस रेफर कर दिए जाते थे। गरीब मरीज कई बार इलाज ही छोड़ देते थे क्योंकि महानगरों का खर्च और ठहरना उनके बस का नहीं था।
*लीनियर एक्सीलेटर: कैंसर पर सर्जिकल स्ट्राइक*
अब जो मशीन आ रही है, वो रेडिएशन को बंदूक की गोली की तरह नहीं, बल्कि लेजर बीम की तरह टारगेट करती है।
*ये कैसे काम करती है?*
लीनियर एक्सीलेटर हाई-एनर्जी एक्स-रे या इलेक्ट्रॉन पैदा करता है। 3D इमेजिंग और कंप्यूटर प्लानिंग से पहले ट्यूमर का पूरा नक्शा बनाया जाता है। फिर बीम को इतना शेप किया जाता है कि वो सिर्फ ट्यूमर के आकार की हो। ट्यूमर के चारों ओर घूमकर ये मशीन अलग-अलग एंगल से वार करती है। नतीजा: ट्यूमर पर फुल डोज, लेकिन किडनी, फेफड़े, दिल जैसे पास वाले अंगों पर नाममात्र का असर।
*मरीज को सीधा फायदा क्या?*
1. *कम साइड इफेक्ट*: मुंह में छाले, स्किन जलना, हमेशा थकान जैसी दिक्कतें 60-70% तक कम हो जाती हैं।
2. *छोटा कोर्स*: कुछ कैंसर में इलाज के सेशन 30 से घटकर 5 रह जाते हैं। इसे SBRT कहते हैं।
3. *बच्चों के लिए वरदान*: बच्चों का शरीर रेडिएशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है। सटीक बीम से उनके ग्रोथ और ब्रेन डेवलपमेंट को बचाया जा सकता है।
4. *दोबारा इलाज मुमकिन*: कोबाल्ट से एक बार रेडिएशन ले चुके अंग पर दोबारा देना रिस्की था। लीनियर एक्सीलेटर से री-ट्रीटमेंट संभव है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आधुनिक कैंसर केयर का बेसिक इंफ्रा लीनियर एक्सीलेटर ही है। जबलपुर का इस लीग में शामिल होना बड़ी छलांग है।
*सिर्फ मशीन नहीं, पूरा इकोसिस्टम बदल रहा*
खबर सिर्फ लीनियर एक्सीलेटर की नहीं है। इसके साथ पीपीपी मोड पर पीईटी-सीटी स्कैन भी शुरू हो रहा है। इसे समझिए।
कैंसर का इलाज शुरू करने से पहले सबसे जरूरी है ‘स्टेजिंग’ यानी यह पता करना कि कैंसर शरीर में कितना फैला है। पीईटी-सीटी स्कैन शरीर का एक तरह का ‘गूगल मैप’ बना देता है। इसमें रेडियोएक्टिव शुगर का इंजेक्शन दिया जाता है। कैंसर कोशिकाएं नॉर्मल कोशिकाओं से ज्यादा शुगर खाती हैं, इसलिए स्कैन में वो चमकने लगती हैं। छाती का छोटा सा ट्यूमर हड्डी तक पहुंचा है या नहीं, यह 30 मिनट में पता चल जाता है।
अभी स्थिति ये है कि पूरे संभाग में सरकारी स्तर पर ये सुविधा नहीं है। प्राइवेट में खर्च 25 से 30 हजार रुपये आता है। पीपीपी मोड में रेट तय होंगे, जिससे आम आदमी की पहुंच में आएगा। सही स्टेजिंग का मतलब है सही इलाज। कई बार बिना पीईटी के मरीज को कम या ज्यादा रेडिएशन दे दिया जाता है। वो गलती अब रुकेगी।
*ग्राउंड जीरो: बंकर से लेकर ब्रेन तक तैयारी*
ऐसी मशीनें लाना प्लग-एंड-प्ले नहीं होता। इसके लिए 6 फीट मोटी कंक्रीट की दीवारों वाला ‘बंकर’ चाहिए होता है ताकि रेडिएशन बाहर लीक न हो। SCI में यह हाई-टेक बंकर पिछले साल ही कंप्लीट कर लिया गया था। मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. नवनीत सक्सेना बताते हैं कि मशीन के पार्ट्स की शिपमेंट जबलपुर आ चुकी है।
अब काम तीन लेवल पर चल रहा है:
1. *इंस्टॉलेशन*: यूरोप से आई इंजीनियरों की टीम और कंपनी के एक्सपर्ट मशीन को असेंबल कर रहे हैं।
2. *कैलिब्रेशन*: फिजिसिस्ट हर बीम एंगल को नापेंगे। 1mm की गलती भी मरीज पर भारी पड़ सकती है, इसलिए 2 महीने सिर्फ टेस्टिंग में लगेंगे।
3. *ट्रेनिंग*: जबलपुर के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट, टेक्नीशियन और नर्सों को नई प्रोटोकॉल पर ट्रेन किया जा रहा है। IMRT, VMAT, IGRT जैसी एडवांस तकनीक अब यहां रोजमर्रा का हिस्सा होंगी।
टारगेट है कि दिसंबर 2026 तक पहला मरीज इस मशीन पर ट्रीट हो जाए।
*’मेडिकल टूरिज्म’ का उल्टा फ्लो शुरू होगा*
आज की तारीख में SCI में हर साल 8 से 10 हजार नए कैंसर मरीज रजिस्टर होते हैं। इनमें से 40% को सिर्फ इसलिए नागपुर, भोपाल या मुंबई रेफर करना पड़ता है क्योंकि जबलपुर में हाई-एंड रेडिएशन नहीं था।
एक मरीज का औसत खर्च जोड़िए: दिल्ली में 2 महीने रुकना, कमरा किराया, खाना, आना-जाना और इलाज। ये बिल 2 से 3 लाख तक पहुंच जाता है। कई परिवार जमीन बेच देते हैं। अब यही इलाज जबलपुर में आयुष्मान भारत योजना के तहत लगभग मुफ्त होगा।
इसका दूसरा पहलू भी है। जबलपुर अब ‘रेफर आउट’ सेंटर से ‘रेफर इन’ सेंटर बनेगा। मंडला, डिंडौरी, उमरिया जैसे आदिवासी जिले जहां से लोग पहले इलाज ही नहीं कराते थे, वहां से अब केस आएंगे। शहडोल, सतना, रीवा के प्राइवेट अस्पताल भी अपने मरीज यहां भेजेंगे। अनुमान है कि 5 साल में SCI की पेशेंट केपेसिटी दोगुनी हो जाएगी।
*चुनौतियां अभी बाकी हैं*
सिर्फ मशीन लगा देना इलाज नहीं है। एक्सपर्ट चेताते हैं:
1. *मैनपावर*: लीनियर एक्सीलेटर चलाने के लिए क्वालिफाइड मेडिकल फिजिसिस्ट और RTT टेक्नीशियन चाहिए। MP में इनकी भारी कमी है। सरकार को तुरंत पोस्ट क्रिएट करनी होंगी।
2. *मेंटेनेंस*: ये मशीनें करोड़ों की हैं। सालाना AMC भी लाखों में होता है। फंड की निरंतरता जरूरी है, वरना मशीन बंद पड़ी रहती है।
3. *अवेयरनेस*: गांवों में अब भी लोग कैंसर को ‘सजा’ मानते हैं। झाड़-फूंक में वक्त बर्बाद करते हैं। जब तक स्टेज 1-2 में मरीज नहीं आएगा, सबसे अच्छी मशीन भी जादू नहीं कर सकती।
SCI प्रशासन का कहना है कि वो कैंसर स्क्रीनिंग वैन चलाकर गांव-गांव कैंप लगाएंगे। मुंह, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती जांच वहीं हो जाएगी।
*आखिर में: एक शहर की नई पहचान*
जबलपुर को अब तक ‘संस्कारधानी’ और ‘आर्मी बेस’ के लिए जाना जाता था। अगले साल से इसकी एक नई पहचान होगी: सेंट्रल इंडिया का कैंसर केयर हब।
25 साल का गैप सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं था। वो हजारों परिवारों की उम्मीद और हिम्मत का गैप था। एक मां जो अपने बच्चे को लेकर AIIMS की लाइन में लगती थी। एक किसान जो कर्ज लेकर मुंबई जाता था। एक बुजुर्ग जो दर्द में कहता था ‘अब जितने दिन कट जाए’।
लीनियर एक्सीलेटर की बीम जब पहली बार किसी मरीज के ट्यूमर पर पड़ेगी, तो वो सिर्फ रेडिएशन नहीं होगा। वो 25 साल से रुकी हुई उम्मीदों का रिलीज होगा। जबलपुर अब सिर्फ इलाज नहीं देगा, वो बीमारी से लड़ने का हौसला वापस देगा। और शायद किसी परिवार को उजड़ने से बचा लेगा।