जबलपुर। बरगी डैम में 30 अप्रैल 2026 को हुए दर्दनाक क्रूज हादसे को दो सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन हादसे की जांच अब भी शुरुआती स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है। इस हादसे में 13 लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद पूरे प्रदेश में शोक और नाराजगी का माहौल बन गया था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घटना के अगले ही दिन पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे।
इसके बाद मध्य प्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने 10 मई 2026 को न्यायिक जांच आयोग गठित करने की अधिसूचना जारी की। हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने की समय-सीमा तय की गई।
लेकिन आयोग गठन के कई दिन बाद भी जांच प्रक्रिया धरातल पर शुरू नहीं हो सकी है। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या बरगी क्रूज हादसे की जांच ठंडे बस्ते में जा रही है?
आयोग बना, लेकिन दफ्तर तक नहीं….
सूत्रों के मुताबिक, जांच आयोग को अभी तक कोई स्थायी कार्यालय उपलब्ध नहीं कराया गया है। आयोग के लिए बैठने की व्यवस्था, जरूरी संसाधन और स्टाफ की नियुक्ति जैसी मूलभूत प्रक्रियाएं भी पूरी नहीं हो पाई हैं।
जानकारी के अनुसार, आयोग को दस्तावेज जुटाने, बयान दर्ज करने और तकनीकी जांच के लिए अलग टीम की जरूरत होगी, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दे रही है।
स्थिति यह है कि आयोग के पास अभी तक नियमित कामकाज शुरू करने के लिए जरूरी आधारभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
तीन महीने की समय-सीमा पर सवाल…
शासन ने आयोग को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। लेकिन अब तक जांच की औपचारिक शुरुआत नहीं होने से समय-सीमा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े हादसे की जांच में तकनीकी रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, सुरक्षा मानकों की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका का परीक्षण जरूरी होता है। इसके लिए पर्याप्त संसाधन और सक्रिय जांच तंत्र होना आवश्यक है।
यदि आयोग को समय पर दफ्तर, स्टाफ और दस्तावेज नहीं मिलते, तो रिपोर्ट तय समय में पूरी होना मुश्किल हो सकता है।
पीड़ित परिवारों में बढ़ रहा आक्रोश …
हादसे में अपने परिजनों को खो चुके परिवार अब जांच में हो रही देरी से नाराज नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि हादसे के बाद बड़े-बड़े दावे तो किए गए, लेकिन अब तक जिम्मेदार लोगों पर ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दी।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि जांच प्रक्रिया में इसी तरह देरी होती रही, तो सच्चाई सामने आने में लंबा समय लग सकता है। लोगों को डर है कि देर होने से महत्वपूर्ण सबूत और तथ्य भी प्रभावित हो सकते हैं।