जबलपुर। जबलपुर सहित प्रदेश में प्रस्तावित जनबस सेवा को लेकर उपभोक्ता संगठनों ने गंभीर आपत्ति जताई है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने प्रदेश सरकार द्वारा जनबसों का यात्री किराया निजी ऑपरेटरों के हाथों में सौंपने की नीति का कड़ा विरोध किया है। मंच ने परिवहन मंत्री उदयप्रताप सिंह और मुख्य सचिव अनिरुद्ध जैन को पत्र भेजकर कहा है कि यह फैसला आम यात्रियों पर भारी आर्थिक बोझ डाल देगा और पूरे शहर की सार्वजनिक यातायात व्यवस्था को अनुचित तरीके से निजी कंपनियों के नियंत्रण में ले जाएगा।
गौरतलब है की प्रदेश सरकार ने हाल ही में 18 नवंबर को आयोजित समीक्षा बैठक में निर्णय लिया कि प्रदेश के 25 जिलों में 6000 से 10,879 जनबसें चलाई जाएंगी, इनका संचालन निजी ऑपरेटर करेंगे, और इन्हीं निजी कंपनियों को बसों का यात्री किराया तय करने का अधिकार भी दिया जाएगा। यह योजना अप्रैल 2026 से लागू होने वाली है।
जबलपुर जैसे बड़े और घनी आबादी वाले शहर में इस व्यवस्था को लेकर सबसे अधिक विरोध दिखाई दे रहा है। शहर में पहले से ही ऑटो–ई-रिक्शा–मिनी बस ऑपरेटर्स के किराया निर्धारण को लेकर विवाद चलता रहा है। ऐसे में जनबस का किराया भी निजी ऑपरेटर्स के हवाले कर देने से किरायों की मनमानी होने का डर बढ़ गया है।
आम यात्रियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा…
उपभोक्ता मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नानजपांडे ने कहा कि किराया निर्धारण निजी हाथों में देने का मतलब है कि आने वाले समय में जबलपुर का सामान्य नागरिक महंगी बस सेवाओं के कारण परेशान होगा। सार्वजनिक परिवहन को व्यावसायिक लाभ के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। मंच ने कहा कि सरकार द्वारा बनाई गई मॉनिटरिंग कमेटी सिर्फ संचालन और अनुशासन देखेगी, जबकि उसे किराया तय करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। इसलिए एक अलग किराया निर्धारण समिति का गठन जरूरी है जिसमें उपभोक्ता प्रतिनिधि, स्थानीय प्रशासन और परिवहन विशेषज्ञ शामिल हों।
सरकार ने गठित की नई कंपनी ..
मंच ने यह भी बताया कि सरकार नई बसों के संचालन के लिए “परिवहन एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड” कंपनी बना रही है। लेकिन कंपनी बसें खरीदकर निजी ऑपरेटर्स को देगी, किराया भी वही तय करेंगे, मॉनिटरिंग कमेटी के पास सिर्फ निरीक्षण का अधिकार होगा। इस व्यवस्था को जबलपुर के उपभोक्ता संगठन “पूर्ण निजीकरण” की ओर एक कदम मान रहे हैं।
डॉ. नाजपांडे ने पत्र में लिखा किराया निर्धारण का अधिकार निजी कंपनियों को न दिया जाए, प्रदेश स्तर पर एक अलग किराया निर्धारण समिति का गठन हो, समिति में जबलपुर उपभोक्ता प्रतिनिधियों को भी जोड़ा जाए, किराया स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाए, जनबस सेवा को “जन-हित” के सिद्धांत पर चलाया जाए. बैठक में मंच के पदाधिकारी राजत भार्गव, एड. देवकान्त अश्ठौलिया, डी.आर. लखेवा सहित अन्य सदस्य उपस्थित थे।
जबलपुर में क्यों बढ़ी चिंता….
गौरतलब है की जबलपुर में रोजाना हजारों लोग बस सेवा पर निर्भर हैं सिविल लाइन, अधारताल, मदन महल, रानीताल, गोरखपुर, घमापुर, भेड़ाघाट रोड, कटनी रोड, चौहान टाउन जैसे क्षेत्रों में कामकाज, स्कूल-कॉलेज और दफ्तर जाने वालों के लिए बसें ही प्रमुख साधन हैं।
अगर निजी ऑपरेटर किराया बढ़ाते हैं तो इसका असर सबसे ज़्यादा मजदूरों, छात्रों, कम आय वाले परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों से आने-जाने वाले यात्रियों पर पड़ेगा।
जबलपुर में पहले ही पेट्रोल-डीजल–ऑटो किराया महंगा हो चुका है। ऐसे में सार्वजनिक ट्रांस्पोर्ट ही आम लोगों के लिए सबसे सस्ता और भरोसेमंद विकल्प थी। इसलिए किराया निजी हाथों में जाने को लेकर स्थानीय स्तर पर गंभीर चिंता बढ़ी है।