पराली न जलाने के सख्त आदेशों से किसान भयभीत, भारत कृषक समाज में पुर्नविचार करने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा


जबलपुर। भारतीय कृषक समाज ने पराली जलाने के संबंध में जारी किए गए दिशा निर्देशों पर पुर्निवचार करने मुख्यमंत्री और मुख्यसचिव के साथ साथ सभी सांसद, विधायकों और संभागायुक्त व कलेक्टर को पत्र प्रेषित किया है|

पत्र में कहा गया है कि सभी किसान पराली जलाने से जमीन व खेती के तथा पर्यावरण के नुकसान से भलीभाँति परिचित हैं और पराली न जलाने के शत प्रतिशत पक्ष में हैं, लेकिन किसानों की कुछ मजबूरियाँ व समस्याएं हैं|

पत्र में कहा गया है कि देश में व सभी क्षेत्रों में 85 प्रतिशत से भी अधिक संख्या लघु व सीमान्त किसानों की है, जिनके पास 5 एकड़ से कम खेती की जमीन है।

पराली जलाने के विकल्प व संसाधन जैसे सुपर व हैप्पी सीडर, रीपर, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम(एस एम एस),बेलर मशीनें, भूसा बनाने या खेत में पराली गलाने के उपाय आदि अभी आम व छोटे किसानों की पहुंच से बाहर हैं।

रीपर, सुपर सीडर, एस एम एस सिस्टम आदि सक्षम, गिने चुने किसानों व एजेंसियों के पास ही उपलब्ध हैं। जिनका उपयोग केवल उनके द्वारा उनके ही खेत में या कुछ थोड़े से किसानों के यहां ही किया जा पाता है।

आम किसान उनकी सेवाएं लेने से वंचित रह जाते हैं। ये संसाधन अभी बहुत ही सीमित मात्रा व संख्या में उपलब्ध हैं। और ऐसे उपलब्ध साधनों के पर्याप्त प्रचार प्रसार के न होने से किसान उनका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

उच्चतम न्यायलय द्वारा भी पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने व किसानों के नुकसान की प्रतिपूर्ति के स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये गये हैं, परन्तु उस पर भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं हो पाई है।

अब ऐसे में शासन, प्रशासन द्वारा बिना एस एम एस के हारवेस्टरों का प्रवेश पर रोक लगाना, किसान पर एफ आई आर की चेतावनी आदि सख्त कदम, किसान हित में नहीं होगें।


अतः पत्र में अनुरोध किया गया है कि जब तक पर्याप्त संसाधन और विकल्प आम किसान की आसानी से अप्रोच में न आ जायें तब तक इस तरह के सख्त कदम न उठाएं जाएँ। ऐसे आदेशों को तुरंत वापिस लिया जाए।

भारत कृषक समाज, महाकौशल के अध्यक्ष इंजीनियर केके अग्रवाल ने मुख्यमंत्री को प्रेषित पत्र में कहा है कि इन सख्त आदेशो के कारण किसान असमंजस में है उनमें घबराहट व्याप्त है।

वे आक्रोशित भी हैं तथा उन्हें अपनी आवाज शासन प्रशासन तक पहुँचाने व विरोध जताने हेतु संघर्ष, धरना प्रदर्शन करने मजबूर होना पड़ रहा है। उनकी मजबूरी है की जगह जगह वे आंदोलित हैँ ।